मुस्लिम महिला के भरण-पोषण मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला, दूसरा निकाह वैध नहीं

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तलाक की डिक्री नहीं, तलाक की तारीख महत्वपूर्ण: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुस्लिम महिला के भरण-पोषण मामले में बड़ा फैसला देते हुए कहा कि तलाक की डिक्री घोषणात्मक होती है और तलाक की प्रभावी तारीख उच्चारण की तारीख मानी जाएगी, मामला फैमिली कोर्ट को पुनर्विचार के लिए वापस।


मुस्लिम महिला के भरण-पोषण मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला

Allahabad High Court ने भरण-पोषण (maintenance) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में मुस्लिम महिला को राहत देते हुए प्रयागराज फैमिली कोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि तलाक की डिक्री (decree) केवल घोषणात्मक होती है और तलाक की प्रभावी तारीख वह मानी जाएगी जिस दिन तलाक का उच्चारण किया गया था, न कि जिस दिन अदालत ने डिक्री पारित की।

यह आदेश न्यायमूर्ति Madan Pal Singh की एकल पीठ ने पारित किया।


फैमिली कोर्ट ने क्यों खारिज किया था भरण-पोषण

मामला प्रयागराज निवासी हुमैरा रियाज से जुड़ा है, जिन्होंने फैमिली कोर्ट के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। फैमिली कोर्ट ने महिला को उसके दूसरे पति से भरण-पोषण देने की मांग को खारिज कर दिया था और केवल उसके दो नाबालिग बेटों के लिए भरण-पोषण देने का आदेश दिया था।

फैमिली कोर्ट का कहना था कि महिला ने अपने पहले पति से तलाक की कानूनी प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही दूसरा निकाह कर लिया था, इसलिए दूसरी शादी वैध नहीं मानी जा सकती और उसे दूसरे पति से भरण-पोषण का अधिकार नहीं मिलेगा।


क्या था पूरा विवाद

महिला के अधिवक्ता के अनुसार:

  • महिला का पहला निकाह फरवरी 2002 में हुआ
  • 27 फरवरी 2005 को पहले पति ने तलाक दे दिया
  • बाद में पहले पति ने फैमिली कोर्ट में घोषणात्मक वाद दायर किया
  • फैमिली कोर्ट ने 8 जनवरी 2013 को 2005 के तलाक को वैध घोषित किया
  • महिला ने ‘इद्दत’ अवधि पूरी करने के बाद 27 मई 2012 को दूसरा निकाह कर लिया
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दूसरे पति से महिला के दो बेटे हुए और पति ने बच्चों के पितृत्व को भी स्वीकार किया। इसके बावजूद पति ने पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण से इनकार कर दिया।


दूसरे पति की दलील

दूसरे पति की ओर से दलील दी गई कि महिला की पहली शादी तब तक समाप्त नहीं हुई थी जब तक 8 जनवरी 2013 को फैमिली कोर्ट ने तलाक की डिक्री पारित नहीं की। इसलिए 2012 में किया गया दूसरा निकाह वैध नहीं माना जा सकता।

यह भी कहा गया कि महिला पहले पति से गुजारा भत्ता ले रही थी और उसने यह तथ्य छिपाकर दूसरी शादी की।


हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की गलती बताई

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि फैमिली कोर्ट ने यह मानकर गलती की कि तलाक की वैधता अदालत की डिक्री की तारीख से शुरू होती है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम कानून के अनुसार:

  • तलाक उस तारीख से प्रभावी होता है जिस दिन तलाक का उच्चारण किया जाता है
  • अदालत की डिक्री केवल उस तलाक की घोषणा (declaratory decree) होती है
  • अदालत का आदेश कोई नया तलाक नहीं बनाता, बल्कि पहले से हुए तलाक की पुष्टि करता है

अदालत ने कहा कि ऐसी डिक्री घोषणात्मक प्रकृति की होती है और उसका प्रभाव तलाक के उच्चारण की तारीख से माना जाएगा।


मामला फिर से फैमिली कोर्ट भेजा

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए मामले को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि फैमिली कोर्ट:

  • तलाक की वास्तविक प्रभावी तारीख पर विचार करे
  • घोषणात्मक डिक्री की प्रकृति को ध्यान में रखे
  • सभी साक्ष्यों की पुनः जांच करे
  • भरण-पोषण के दावे पर मेरिट के आधार पर नया निर्णय दे
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हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि फैमिली कोर्ट इस मामले का निर्णय छह महीने के भीतर करने का प्रयास करे।


फैसले का कानूनी महत्व

यह फैसला महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत ने स्पष्ट किया:

  1. मुस्लिम कानून में तलाक की प्रभावी तारीख उच्चारण की तारीख होती है
  2. अदालत की तलाक डिक्री केवल घोषणात्मक होती है
  3. डिक्री की तारीख से तलाक प्रभावी नहीं माना जाएगा
  4. दूसरी शादी की वैधता तय करने में यह सिद्धांत महत्वपूर्ण होगा
  5. भरण-पोषण के मामलों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है

निष्कर्ष

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला मुस्लिम विवाह और तलाक कानून तथा भरण-पोषण कानून के मामलों में महत्वपूर्ण नजीर साबित हो सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि तलाक की डिक्री को तलाक की शुरुआत नहीं माना जा सकता, बल्कि वह केवल पहले से दिए गए तलाक की कानूनी पुष्टि होती है। अब फैमिली कोर्ट को नए सिरे से भरण-पोषण के मामले पर निर्णय लेना होगा।


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