Ex-BrahMos Engineer Case: साइबर टेररिज़्म व जासूसी के गंभीर आरोप हुए ख़ारिज; हाई कोर्ट ने सिर्फ़ ‘लापरवाही’ का दोष माना — विस्तृत विश्लेषण
ब्रह्मोस मिसाइल परियोजना के एक्स-इंजीनियर के खिलाफ साइबर टेररिज़्म और जासूसी के आरोप सबूतों के अभाव में रद्द। कोर्ट ने कहा—इरादा (mens rea) प्रमाणित नहीं हुआ; अभियुक्त केवल गोपनीय दस्तावेजों की सुरक्षित रखरखाव में लापरवाही का दोषी। Section 5(1)(d) Official Secrets Act के तहत 3 साल की सज़ा बरकरार।
Ex-BrahMos Engineer को साइबर टेररिज़्म से बरी, केवल “Negligence” का दोष तय — बॉम्बे हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
एंटी-टेररिस्ट स्क्वॉड (ATS) की जांच से जुड़े अत्यंत संवेदनशील ब्रह्मोस मिसाइल तकनीक लीक मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट की जस्टिस अनिल एस. किलोर एवं जस्टिस प्रवीन एस. पाटिल की खंडपीठ ने एक अहम निर्णय सुनाया।
Court ने कहा:
❌ Cyber Terrorism (Sec 66-F IT Act) — साबित नहीं
❌ Espionage/जासूसी (Sec 3, 5(1)(a)(b)(c), 5(3) OSA) — साबित नहीं
✔️ Negligence in handling secret data (Sec 5(1)(d) OSA) — हाँ
इस प्रकार, आजीवन कारावास और 14 साल की कठोर सज़ा समेत लगभग सभी आरोप खारिज कर दिए गए। कोर्ट ने केवल 3 साल के कारावास (जो Section 5(1)(d) के तहत है) को ही बरकरार रखा और CrPC 428 के तहत set-off भी दिया।
🔹 Case Background
ATS को इनपुट मिले थे कि:
- पाकिस्तान से संचालित दो फर्जी Facebook अकाउंट
- भारत के रक्षा प्रतिष्ठानों के कर्मचारियों को “हनी ट्रैप” करने की कोशिश
- संवेदनशील डेटा लीक होने की आशंका
जांच में अभियुक्त इंजीनियर के लैपटॉप से “BrahMos missile related documents” मिले—एक दस्तावेज़ “secret” मार्किंग के साथ।
प्रॉसिक्यूशन का दावा था कि अभियुक्त ने:
- X-Trust
- Q-Whisper
- Chat2Hire
जैसे मैलवेयर के ज़रिये डेटा ट्रांसफर किया।
लेकिन अभियुक्त का बचाव:
ये सभी दस्तावेज़ उसकी वैध परियोजना (CPHS) से जुड़े थे और उसे अपने वरिष्ठ अधिकारी के निर्देश पर मिला एवं वह अधिकृत था।
🔹 मुद्दा (Issues)
- क्या अभियुक्त ने जानबूझकर गुप्त रक्षा दस्तावेज़ कॉपी व साझा किए?
- क्या उसका इरादा साइबर टेररिज़्म करने का था?
- क्या अभियुक्त ने अधिकृत पहुंच (authorized access) से अधिक पहुंच प्राप्त की?
🔹 Court की मुख्य टिप्पणियाँ
✔️ 1. Section 66-F IT Act के लिए “Intent to harm India’s security” आवश्यक
कोर्ट ने कहा:
“साइबर टेररिज़्म का अपराध तभी बनता है जब आरोपी की intention भारत की सुरक्षा, संप्रभुता या अखंडता को क्षति पहुंचाने की हो।”
लेकिन:
- न कोई डेटा असल में “लीक” सिद्ध हुआ
- न मैलवेयर इस्तेमाल से किसी ट्रांसफर का सबूत
- न कोई सबूत कि अभियुक्त का उद्देश्य भारत की सुरक्षा को नुकसान पहुंचाना था
इसलिए साइबर टेररिज़्म—सिद्ध नहीं।
✔️ 2. OSA की धाराओं 3 और 5 के लिए ‘mens rea’ अनिवार्य
जासूसी तब साबित होती है जब अभियुक्त:
- जानबूझकर
- गुप्त दस्तावेज़
- किसी विदेशी एजेंट को
- राज्य के हितों को नुक़सान पहुँचाने के उद्देश्य से
- “संचारित” करे
यहाँ कोर्ट ने पाया:
- रिकॉर्ड पर कहीं भी “intentional leak” नहीं
- superior officer ने कभी शिकायत नहीं की
- अभियुक्त को अधिकृत एक्सेस था
- कई दस्तावेज़ सामान्य सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध थे
- जो दस्तावेज़ मिले वे “पूरी तरह गुप्त” नहीं बल्कि “आंशिक जानकारी” थे
इसलिए espionage charges अस्थापित।
✔️ 3. डेटा कॉपी करने के कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं
- कोई पेन ड्राइव/हार्ड डिस्क उपयोग का रिकॉर्ड नहीं
- न कोई forensic evidence कि डेटा “extract” किया गया
- कई गवाहों ने स्वीकार किया कि अभियुक्त को अधिकृत एक्सेस था
✔️ 4. अभियुक्त का आचरण—“Gym-हनी ट्रैप” चैट = Overseas Job Interest
“Sejal Kapoor” के साथ चैट से यह स्पष्ट था कि अभियुक्त:
- विदेश में नौकरी चाहता था
- ब्रह्मोस से जुड़ा कोई दस्तावेज़ नहीं भेजा
- “हनी ट्रैपिंग” सिद्ध नहीं
🔹 क्या सिद्ध हुआ?
✔️ Negligence (Section 5(1)(d) OSA)
कोर्ट ने कहा:
- अभियुक्त ने लापरवाही से हानिकारक मैलवेयर डाउनलोड किया
- reasonable care नहीं लिया
इसलिए केवल लापरवाही का अपराध सिद्ध हुआ, जो Section 5(1)(d) को आकर्षित करता है।
🔹 Final Verdict
❌ Cyber Terrorism (Sec 66-F IT Act) — Acquitted
❌ Espionage (OSA Sections 3(1)(c), 5(1)(a)(b)(c), 5(3)) — Acquitted
✔️ Negligence (Sec 5(1)(d) OSA) — Conviction Upheld (3 years)
अभियुक्त को पहले से बिताई गई अवधि (underCrPC 428) का लाभ दिया गया।
🟦 Case Title:
Nishant Agrawal v. Anti-Terrorist Squad, Lucknow
Criminal Appeal No. 303 of 2024 — Decided on 01-12-2025
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