सुप्रीम कोर्ट: बीएनएसएस की धारा 175(3) के तहत पुलिस अधिकारी की दलीलों पर विचार अनिवार्य

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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि सीआरपीसी की धारा 156(3) के विपरीत, बीएनएसएस की धारा 175(3) के तहत मजिस्ट्रेट को जांच का आदेश देने से पहले पुलिस अधिकारी द्वारा प्रस्तुत दलीलों पर विचार करना अनिवार्य होगा।

न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट द्वारा बिना किसी ठोस जांच के आदेश पारित करना न्यायिक प्रक्रिया का उल्लंघन है।

न्यायिक आदेश और पुलिस की जवाबदेही-

शीर्ष अदालत ने कहा कि बीएनएसएस की धारा 175(3) ने पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही को और अधिक सख्त कर दिया है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस धारा के तहत मजिस्ट्रेट को जांच का आदेश देने से पहले पुलिस अधीक्षक की रिपोर्ट को अनिवार्य रूप से देखना होगा।

सीआरपीसी और बीएनएसएस में प्रमुख अंतर-

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) बीएनएसएस के प्रावधानों की तुलना सीआरपीसी (CrPC) से करते हुए कहा कि-

1. एफआईआर दर्ज करने से इनकार करने पर पुलिस अधीक्षक के पास अपील अनिवार्य होगी।
2. मजिस्ट्रेट को जांच के आदेश देने से पहले आवश्यक जांच करने की शक्ति दी गई है।
3. एफआईआर दर्ज करने के इनकार पर पुलिस अधिकारी की दलीलों को अनिवार्य रूप से सुनना होगा।

मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश रद्द-

सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आईपीसी की धारा 323, 294, 500, 504 और 506 के तहत अपराधों के लिए एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया गया था।

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अदालत का निष्कर्ष-

कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट को केवल शिकायतकर्ता की याचिका पर विचार करने के बजाय, पुलिस की दलीलों पर भी विचार करना होगा, जिससे न्यायिक आदेश निष्पक्ष और कानूनी रूप से मजबूत होंगे।

वाद शीर्षक – ओम प्रकाश अंबेडकर बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य

 

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