धारा 406 और 420 को लेकर पुलिस–मजिस्ट्रेटों में भ्रम चिंताजनक: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रशिक्षण पर दिया जोर

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आईपीसी की धारा 406 और 420 के अपराध एक साथ लगाए जा सकते हैं, जबकि कानूनन यह संभव नहीं है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि आईपीसी की धारा 406 और 420 अलग-अलग अपराध हैं और दोनों एक साथ नहीं हो सकते। कोर्ट ने पुलिस व मजिस्ट्रेटों को कानून का समुचित प्रशिक्षण देने की जरूरत बताई।

प्रयागराज

धारा 406 और 420 को लेकर पुलिस–मजिस्ट्रेटों में भ्रम चिंताजनक: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रशिक्षण पर दिया जोर

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में पुलिस अधिकारियों और न्यायिक मजिस्ट्रेटों की कानून संबंधी समझ पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि उन्हें उचित प्रशिक्षण दिया जाना आवश्यक है, ताकि वे आईपीसी की धारा 406 (आपराधिक न्यास भंग) और धारा 420 (कपट/धोखाधड़ी) के बीच के बुनियादी अंतर को समझ सकें।

न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव ने यह टिप्पणी प्रभा सिंह एवं एक अन्य की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए की। अदालत ने स्पष्ट कहा कि कपट और आपराधिक न्यास भंग “ट्विन ऑफेंस” नहीं हैं, बल्कि दोनों का स्वतंत्र और परस्पर विरोधी अस्तित्व है।

406 और 420 एक साथ नहीं चल सकतीं

हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस और मजिस्ट्रेटों के स्तर पर यह भ्रम व्याप्त है कि आईपीसी की धारा 406 और 420 के अपराध एक साथ लगाए जा सकते हैं, जबकि कानूनन यह संभव नहीं है

अदालत ने स्पष्ट किया कि:

  • कपट (Cheating) का अपराध आईपीसी की धारा 415 में परिभाषित है और धारा 420 में दंडनीय है
  • आपराधिक न्यास भंग (Criminal Breach of Trust) आईपीसी की धारा 405 में परिभाषित है और धारा 406 में दंडनीय है
  • यदि संपत्ति शुरू से ही धोखे और बेईमानी से प्राप्त की गई हो, तो वह कपट का मामला होगा
  • यदि संपत्ति वैध विश्वास के साथ दी गई हो और बाद में विश्वास तोड़कर हड़पी जाए, तो वह न्यास भंग का अपराध होगा
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कोर्ट ने कहा कि एक ही लेन-देन में दोनों अपराध एक साथ घटित नहीं हो सकते और इसलिए दोनों धाराओं में एक साथ आपराधिक कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती

एसीजेएम गोरखपुर का समन आदेश रद्द

हाईकोर्ट ने इस मामले में अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM), गोरखपुर द्वारा आईपीसी की धारा 406, 420, 467, 468, 471 और 120-B के तहत जारी समन आदेश को रद्द कर दिया।

साथ ही, अदालत ने मामले को सुप्रीम कोर्ट के ‘दिल्ली रेस क्लब बनाम स्टेट’ फैसले के आलोक में नए सिरे से आदेश पारित करने के लिए वापस भेज दिया

याचियों की ओर से दलील

याचियों की ओर से अधिवक्ता अक्षय सिंह रघुवंशी, अरविंद सिंह और बी.के. सिंह रघुवंशी ने दलील दी कि:

कपट और आपराधिक न्यास भंग किसी भी स्थिति में परस्पर निर्भर नहीं हैं
कपट में शुरुआत से ही बेईमान मंशा आवश्यक है, जबकि न्यास भंग में संपत्ति विश्वासपूर्वक और वैध रूप से दी जाती है, जिसे बाद में हड़पा जाता है।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के दिल्ली रेस क्लब केस का हवाला देते हुए कहा कि मंशा (mens rea) ही दोनों अपराधों को अलग करती है।

गोरखपुर के खोराबार थाना क्षेत्र का मामला

यह मामला गोरखपुर जिले के खोराबार थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जहां संपत्ति हड़पने के आरोप में अभियुक्त के खिलाफ समन जारी किया गया था। हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब गोरखपुर की निचली अदालत को मामले में पुनः सुनवाई करनी होगी

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व्यवस्था पर सख्त संदेश

हाईकोर्ट की यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पुलिस जांच और मजिस्ट्रेटी स्तर पर यांत्रिक रूप से धाराएं जोड़ने की प्रवृत्ति पर एक कड़ा संदेश मानी जा रही है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कानूनी अज्ञानता के आधार पर नागरिकों को आपराधिक मुकदमों में नहीं झोंका जा सकता

Tags: Allahabad High Court, IPC Section 406, IPC Section 420, Criminal Breach of Trust, Cheating, Judicial Magistrate, Police Training, Delhi Race Club Case

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