15 साल पुराने CBI केस में कारोबारी बरी, अदालत ने कहा – थिनर-रिड्यूसर आवश्यक वस्तु नहीं

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RTI का जवाब – केस का टर्निंग पॉइंट

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने CBI के 15 साल पुराने मामले में कारोबारी मनीष कुमार अग्रवाल और उनकी फर्म को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि थिनर और रिड्यूसर आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत नहीं आते, इसलिए EC Act के तहत मामला बनता ही नहीं।

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा दर्ज एक 15 साल पुराने मामले में कारोबारी मनीष कुमार अग्रवाल और उनकी फर्म मेसर्स रिलायबल इंडस्ट्रीज को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जिस आधार पर अभियोजन ने आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत मामला बनाया था, वह कानूनी रूप से टिक ही नहीं सकता क्योंकि थिनर और रिड्यूसर आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी में आते ही नहीं हैं।

यह मामला अप्रैल 2009 से मार्च 2010 के बीच दाखिल किए गए एक रिटर्न से जुड़ा था, जिसमें दिखाया गया था कि फर्म को M/s Rainbow Petrochemicals से 10.63 करोड़ रुपये से अधिक की राशि प्राप्त हुई। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि यह एंट्री रिड्यूसर और उससे संबंधित उत्पादों की बिक्री की थी, जबकि वास्तव में कोई सप्लाई नहीं हुई थी और ये लेन-देन फर्जी थे। CBI के अनुसार इन एंट्री का इस्तेमाल पेट्रोलियम उत्पादों, विशेष रूप से नेफ्था, के डायवर्जन को छिपाने के लिए किया गया था।

मामले की सुनवाई के दौरान एक आरटीआई जवाब इस केस का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। आरटीआई के तहत उपभोक्ता, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय से पूछा गया था कि क्या थिनर और रिड्यूसर आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत आते हैं। मंत्रालय ने अपने जवाब में स्पष्ट रूप से कहा कि थिनर और रिड्यूसर औद्योगिक रासायनिक उत्पाद हैं और इन्हें आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी में शामिल नहीं किया गया है।

अदालत ने कहा कि जब यह आधिकारिक आरटीआई RTI जवाब रिकॉर्ड पर आ गया, तब अभियोजन की जिम्मेदारी थी कि वह कोई नोटिफिकेशन या वैधानिक दस्तावेज पेश कर यह साबित करे कि ये उत्पाद आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे में आते हैं। हालांकि अभियोजन ऐसा कोई दस्तावेज पेश नहीं कर पाया। अदालत ने कहा कि इस स्थिति में आवश्यक वस्तु अधिनियम की धारा 3 और 7 के तहत अपराध का मूल आधार ही समाप्त हो जाता है।

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सुप्रीम कोर्ट का सिद्धांत – केवल शक पर मुकदमा नहीं

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट का सिद्धांत दोहराया:

मुकदमा तभी चलाया जाना चाहिए जब गंभीर संदेह (grave suspicion) हो,
केवल शक (suspicion) के आधार पर नहीं।

यह आपराधिक कानून का बहुत महत्वपूर्ण सिद्धांत है:
Suspicion, however strong, cannot take the place of proof.

अदालत ने CBI की जांच की भी कड़ी आलोचना की और कहा कि जांच कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अधूरी और अपर्याप्त रही। अदालत ने नोट किया कि आरोपी के परिसर से नेफ्था या उससे संबंधित किसी भी पदार्थ की कोई बरामदगी नहीं हुई। किसी रासायनिक जांच से यह साबित नहीं हुआ कि कथित उत्पादों में पेट्रोलियम के अंश थे। यह भी साबित नहीं किया जा सका कि नेफ्था को थिनर या रिड्यूसर में परिवर्तित किया गया था। इसके अलावा फर्म की कानूनी स्थिति, यानी वह पार्टनरशिप थी या प्रोपराइटरशिप, यह भी स्पष्ट नहीं किया गया। अभियोजन यह भी स्पष्ट नहीं कर पाया कि मामला स्लॉप ऑर्डर या नेफ्था ऑर्डर के तहत आता है या नहीं।

अदालत ने CBI जांच में 5 बड़ी खामियां बताईं

अदालत ने CBI जांच को अपर्याप्त (inadequate investigation) कहा और ये बड़ी कमियां बताईं:

  1. आरोपी के परिसर से Naptha या कोई पेट्रोलियम पदार्थ बरामद नहीं हुआ
  2. कोई रासायनिक जांच नहीं जिससे साबित हो कि उत्पाद पेट्रोलियम से बने थे
  3. यह साबित नहीं हुआ कि Naptha को Thinner/Reducer में बदला गया
  4. फर्म की कानूनी स्थिति (Partnership या Proprietorship) स्पष्ट नहीं
  5. यह भी स्पष्ट नहीं कि Slop Order या Naptha Order लागू होते थे या नहीं
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अदालत ने कहा:

अभियोजन को ऐसे सबूत पेश करने चाहिए थे जिन पर भरोसा किया जा सके, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आपराधिक मुकदमा केवल शक के आधार पर नहीं चलाया जा सकता। मुकदमा चलाने के लिए ऐसे सबूत होने चाहिए जिनसे गंभीर संदेह उत्पन्न हो और अपराध की संभावना स्पष्ट हो। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि आरोपी लगभग 15 वर्षों तक आपराधिक कार्यवाही का सामना करता रहा, जबकि अभियोजन अपराध साबित करने में असफल रहा।

इन सभी कारणों से अदालत ने मनीष कुमार अग्रवाल और उनकी फर्म को आईपीसी की धारा 120बी (आपराधिक साजिश), आवश्यक वस्तु अधिनियम की धारा 3 और 7, स्लॉप कंट्रोल ऑर्डर 2000 और नेफ्था कंट्रोल ऑर्डर 2000 के तहत लगाए गए सभी आरोपों से बरी कर दिया।

यह फैसला आपराधिक मामलों में जांच की गुणवत्ता, वैधानिक आधार और अभियोजन की जिम्मेदारी के महत्व को रेखांकित करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक कानून का लागू होना ही साबित न हो, तब तक उस कानून के तहत अपराध का मामला नहीं बनाया जा सकता।

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