सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार CBI द्वारा जांचे गए मामलों में बरी के खिलाफ अपील नहीं कर सकती। अदालत ने लालू प्रसाद यादव केस (2010) के सिद्धांत को दोहराते हुए स्पष्ट किया कि CrPC की धारा 378 के तहत अपीलीय अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है।
📰 सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: राज्य सरकार CBI द्वारा जांचे गए मामलों में बरी के खिलाफ अपील नहीं कर सकती, ललू प्रसाद यादव केस के सिद्धांत की फिर पुष्टि
नई दिल्ली | विधि संवाददाता:
सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले “लालू प्रसाद यादव बनाम बिहार राज्य” (2010) 5 SCC 1 के सिद्धांत को दोहराते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी आपराधिक मामले की जांच और अभियोजन CBI द्वारा की गई है, तो राज्य सरकार उस मामले में बरी के खिलाफ अपील दायर नहीं कर सकती।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, संजय करोल और संदीप मेहता की तीन-न्यायाधीशीय पीठ ने यह अहम निर्णय छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित ऐश्वर्य जोगी के खिलाफ दर्ज बहुचर्चित हत्या मामले में सुनाया।
⚖️ मामला: रामअवतार जागी हत्याकांड और अमित जोगी की बरी
यह मामला 4 जून 2003 को राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी नेता रामअवतार जागी की हत्या से जुड़ा है।
पहले FIR नं. 104/2003 राज्य पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 307 और 427 के तहत दर्ज की थी।
पीड़ित के पुत्र सतीश जागी की मांग पर 3 जनवरी 2004 को राज्य सरकार ने जांच CBI को सौंप दी।
CBI ने नई चार्जशीट दाखिल की, जिसमें अमित जोगी सहित अन्य पर साजिश का आरोप लगाया गया।
ट्रायल कोर्ट ने 28 आरोपियों को दोषी ठहराया, लेकिन अमित जोगी को सबूतों की कमी के आधार पर बरी कर दिया।
इसके बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने CrPC की धारा 378(3) के तहत हाईकोर्ट में अपील की अनुमति मांगी, लेकिन हाईकोर्ट ने “लालू प्रसाद यादव बनाम बिहार राज्य” (2010) 5 SCC 1 ” का हवाला देते हुए यह आवेदन खारिज कर दिया।
⚖️ सुप्रीम कोर्ट: राज्य और केंद्र की अपीलीय शक्तियां “परस्पर बहिष्कृत” हैं
राज्य सरकार ने दलील दी कि चूंकि प्रारंभिक FIR राज्य पुलिस ने दर्ज की थी और बाद में जांच CBI को सौंपी गई, इसलिए अपील दायर करने का अधिकार उससे छीना नहीं जा सकता।
परंतु न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने अपने विस्तृत निर्णय में कहा:
“धारा 378(1) और 378(2) CrPC दो अलग-अलग सक्षम प्राधिकारों से संबंधित हैं। उपधारा (1) राज्य सरकार के लिए है, जबकि उपधारा (2) केंद्र सरकार के लिए — और दोनों का दायरा परस्पर बहिष्कृत (mutually exclusive) है।”
पीठ ने कहा कि जहां जांच और अभियोजन CBI द्वारा किया गया हो, वहां अपील दायर करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है, राज्य सरकार के पास नहीं।
⚖️ न्यायालय ने भविष्य के लिए एक संवैधानिक प्रश्न खुला छोड़ा
हालांकि कोर्ट ने एक “सीमित अपवाद” पर भी विचार किया। पीठ ने कहा,
“यदि किसी मामले में प्रारंभिक जांच राज्य पुलिस ने की हो और बाद में CBI को सौंप दी गई हो, तो यह प्रश्न खुला रहता है कि क्या ऐसी स्थिति में राज्य सरकार को अपील का अधिकार हो सकता है।”
इस प्रश्न को भविष्य में उचित परिस्थितियों वाले मामले के लिए विचार हेतु छोड़ा गया।
⚖️ CBI की 1,373 दिन की देरी माफ, “गंभीर आरोपों में तकनीकी कारण से मामला न खारिज हो”
CBI ने 1,373 दिन की देरी से अपील दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा:
“अमित जोगी पर विपक्षी राजनीतिक दल के नेता की हत्या की साजिश का गंभीर आरोप है। ऐसे मामलों को केवल तकनीकी आधार पर खारिज करना न्याय के हित में नहीं होगा।”
कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट को देरी माफ कर मामले के गुण-दोष पर निर्णय करना चाहिए था।
⚖️ पीड़ित के अपील अधिकार पर भी स्पष्टीकरण
सतीश जागी (पीड़ित के पुत्र) ने भी धारा 372 CrPC के तहत अपील दायर की थी। लेकिन कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान 31 दिसंबर 2009 को लागू हुआ, जबकि बरी का आदेश 31 मई 2007 को पारित हुआ था।
इसलिए पीड़ित को उस समय अपील का वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं था।
🏛️ सुप्रीम कोर्ट का आदेश
- CBI की अपील स्वीकार की गई और देरी माफ करते हुए मामला हाईकोर्ट को पुनर्विचार हेतु वापस भेजा गया।
- छत्तीसगढ़ सरकार और पीड़ित की अपीलें खारिज की गईं।
- सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि चूंकि देरी अत्यधिक थी, इसलिए इस बार अमित जोगी को लीव-टू-अपील चरण में भी सुनवाई का अवसर दिया जाएगा।
केस का शीर्षक: छत्तीसगढ़ राज्य बनाम अमित ऐश्वर्या जोगी
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