सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला — ‘किसी को भी DNA टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, यह निजता पर गंभीर हमला है’

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🧬 सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला — ‘किसी को भी DNA टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, यह निजता पर गंभीर हमला है’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी को भी DNA टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। ऐसा आदेश निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए कहा — “वैधता की धारणा तभी टूटेगी जब ठोस सबूत हों।”

नई दिल्ली | विधि संवाददाता: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि किसी व्यक्ति को जबरन डीएनए टेस्ट (DNA Test) के लिए बाध्य करना उसके निजता (Privacy) और शारीरिक स्वायत्तता (Bodily Autonomy) के अधिकार का गंभीर उल्लंघन होगा। अदालत ने कहा कि ऐसा निर्देश संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित मौलिक अधिकारों का हनन है।

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और विपुल एम. पंचोली की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक डॉक्टर को कथित प्रेम संबंध और पितृत्व निर्धारण के लिए DNA टेस्ट कराने का निर्देश दिया गया था।


⚖️ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

पीठ ने कहा —

“किसी व्यक्ति को जबरन DNA जांच के लिए विवश करना उसकी निजता और स्वतंत्रता पर गंभीर आक्रमण है। यह तभी उचित ठहराया जा सकता है जब यह तीन कसौटियों — कानूनी वैधता (Legality), वैध राज्य उद्देश्य (Legitimate State Aim) और अनुपातिकता (Proportionality) — पर खरा उतरता हो।”

अदालत ने K.S. Puttaswamy बनाम भारत संघ (2017) के ऐतिहासिक निजता फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी प्रकार का निजी जीवन में हस्तक्षेप तभी वैध होगा जब वह कानून द्वारा अनुमोदित हो, वैध उद्देश्य साधे और अनुपातिक हो।


⚖️ मामला क्या था?

डॉ. आर. राजेंद्रन पर एक महिला ने धोखाधड़ी और उत्पीड़न का आरोप लगाया था। महिला का दावा था कि उसका डॉक्टर से विवाहेतर संबंध था, जिससे 2007 में एक बच्चे का जन्म हुआ।

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मदुरै बेंच ऑफ मद्रास हाईकोर्ट ने 2017 में आदेश दिया था कि डॉक्टर, महिला और बच्चे के खून के नमूने लेकर DNA प्रोफाइलिंग की जाए, ताकि मामले की जांच में मदद मिल सके।

यह FIR आईपीसी की धाराओं 417 और 420 (धोखाधड़ी) तथा तमिलनाडु महिला उत्पीड़न अधिनियम की धारा 4(1) के तहत दर्ज की गई थी।

राजेंद्रन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कहा कि यह आदेश “रोविंग एंड फिशिंग इन्क्वायरी” (अर्थात अनावश्यक खोजबीन) के समान है। उन्होंने भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) की धारा 112 का हवाला दिया, जो यह मान्यता देती है कि विवाह के दौरान जन्मा बच्चा वैध माना जाएगा, जब तक पति-पत्नी के बीच “अप्रवेश” (non-access) सिद्ध न हो जाए।


⚖️ अदालत का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत वैधता की यह धारणा तब तक बनी रहती है जब तक इसके विपरीत “मजबूत, स्पष्ट और ठोस साक्ष्य” न हों।

कोर्ट ने पाया कि बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल रिकॉर्ड, और अन्य आधिकारिक दस्तावेजों में अब्दुल लतीफ़ को पिता बताया गया था, जिससे पितृत्व पर संदेह का कोई आधार नहीं था।

पीठ ने कहा —

“कानून वैधता को बढ़ावा देता है और अवैधता पर अंकुश लगाता है। बच्चे को केवल अपुष्ट आरोपों या संदेह के आधार पर ‘अवैध’ ठहराना समाज और न्याय दोनों के खिलाफ है।”


⚖️ सहमति और निजता पर स्पष्टता

कोर्ट ने कहा कि किसी एक पक्ष की सहमति से दूसरे व्यक्ति को DNA टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

“प्रतिवादी संख्या 1 (महिला) अपनी निजता छोड़ने को तैयार हो सकती हैं, लेकिन इससे दूसरों की निजता खत्म नहीं होती। अपीलकर्ता (डॉक्टर) और बच्चा — जो अब बालिग है — दोनों के पास स्वतंत्र और समान रूप से अभेद्य निजता और गरिमा के अधिकार हैं।”


⚖️ कानूनी दृष्टिकोण

अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल DNA सैंपल देने से इनकार करने पर कोई प्रतिकूल निष्कर्ष (Adverse Inference) नहीं निकाला जा सकता, जब तक वैधता की कानूनी धारणा पहले खारिज न की जाए।

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पीठ ने यह भी कहा कि धोखाधड़ी और उत्पीड़न जैसे अपराधों की जांच के लिए DNA टेस्ट आवश्यक नहीं है।

Goutam Kundu बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1993) के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा —

“किसी को भी जबरन रक्त नमूना देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालतों को DNA टेस्ट के आदेश देने में अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए ताकि इसे अटकलों या प्रयोगात्मक जांच के साधन के रूप में इस्तेमाल न किया जाए।”


⚖️ निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मद्रास हाईकोर्ट ने फौजदारी प्रक्रिया संहिता (CrPC) और साक्ष्य अधिनियम दोनों का गलत उपयोग किया।

कोर्ट ने कहा —

“विज्ञान कितना भी उन्नत क्यों न हो, उसे केवल अटकलबाज़ी के उपकरण के रूप में नहीं इस्तेमाल किया जा सकता। DNA टेस्ट केवल तभी उचित हैं जब उनका स्पष्ट और आवश्यक औचित्य हो।”

अंततः अदालत ने 2017 का आदेश रद्द कर दिया और अपील स्वीकार कर ली।


मामले का शीर्षक: R. Rajendran v. Kamar Nisha


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