भोजशाला विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने MP हाईकोर्ट को दी आपत्तियां तय करने की जिम्मेदारी

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ASI वीडियोग्राफी पर उठी आपत्तियों पर फैसला करने की जिम्मेदारी मध्य प्रदेश हाईकोर्ट को दीSC

सुप्रीम कोर्ट ने भोजशाला–कमाल मौला मस्जिद विवाद में ASI वीडियोग्राफी पर उठी आपत्तियों पर फैसला करने की जिम्मेदारी मध्य प्रदेश हाईकोर्ट को दी, कहा—मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं।


भोजशाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण आदेश

Supreme Court of India ने मध्य प्रदेश के धार जिले स्थित विवादित भोजशाला–कमाल मौला मस्जिद परिसर मामले में एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। अदालत ने कहा कि परिसर की वीडियोग्राफी को लेकर दोनों पक्षों द्वारा उठाई गई आपत्तियों पर निर्णय Madhya Pradesh High Court ही अंतिम सुनवाई के दौरान करेगा।

पीठ का नेतृत्व भारत के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant कर रहे थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने मामले के मेरिट (गुण-दोष) पर कोई राय व्यक्त नहीं की है और सभी मुद्दे हाईकोर्ट के समक्ष खुले रहेंगे।


सुप्रीम कोर्ट: हाईकोर्ट प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर निर्णय करेगा

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि उसे इस बात पर कोई संदेह नहीं है कि हाईकोर्ट वीडियोग्राफी देखने के बाद दोनों पक्षों की आपत्तियों पर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार निर्णय करेगा।

अदालत ने कहा:

हमने मामले के मेरिट पर कोई राय नहीं दी है। सभी मुद्दे हाईकोर्ट में उठाए जा सकते हैं।

इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने मामले को हाईकोर्ट के समक्ष ही जारी रखने का रास्ता साफ कर दिया।


क्या है भोजशाला–कमाल मौला परिसर विवाद

धार जिले में स्थित भोजशाला परिसर को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है।

  • हिंदू पक्ष का दावा है कि यह 11वीं सदी में बना मां सरस्वती (वाग्देवी) का मंदिर है
  • मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह कमाल मौला मस्जिद है, जिसका निर्माण 1514 में महमूद खिलजी द्वितीय के शासनकाल में हुआ
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इस विवाद को लेकर लंबे समय से न्यायालय में मुकदमे लंबित हैं।


MP हाईकोर्ट ने ASI सर्वे कराया था

Archaeological Survey of India (ASI) ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के निर्देश पर भोजशाला परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया था। यह सर्वे करीब 98 दिनों तक चला था और 15 जुलाई 2024 को रिपोर्ट दाखिल की गई थी।

रिपोर्ट में कहा गया कि:

  • वर्तमान संरचना पहले के मंदिर के अवशेषों से निर्मित प्रतीत होती है
  • परिसर में मंदिर वास्तुकला के स्तंभ, मूर्तियां और शिलालेख मिले
  • संस्कृत और प्राकृत शिलालेख, व्याकरण और धार्मिक श्लोक भी मिले

रिपोर्ट के अनुसार परिसर मूल रूप से परमार वंश के राजा भोज द्वारा 11वीं सदी में बनवाया गया सरस्वती मंदिर था।


हाईकोर्ट ने आपत्तियां दाखिल करने का समय दिया

Madhya Pradesh High Court की इंदौर खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान निर्देश दिया था कि ASI रिपोर्ट और वीडियोग्राफी पर यदि किसी पक्ष को आपत्ति या सुझाव देना है, तो अगली सुनवाई से पहले दाखिल करें।

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि अगली सुनवाई से पहले न्यायालय परिसर का निरीक्षण (site visit) भी कर सकता है।

अगली सुनवाई की तारीख 2 अप्रैल निर्धारित की गई थी।


भोज उत्सव समिति ने मांगा अतिरिक्त समय

भोज उत्सव समिति के वकील श्रीश दुबे ने अदालत से सुझाव दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। अदालत ने निर्देश दिया कि सभी आपत्तियां और सुझाव अगली सुनवाई से पहले दाखिल किए जाएं।


भोजशाला का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार:

  • भोजशाला 11वीं सदी में परमार वंश के राजा भोज द्वारा निर्मित सरस्वती मंदिर था
  • यह लगभग 270 वर्षों तक शिक्षा और विद्या का प्रमुख केंद्र रहा
  • 1305 में अलाउद्दीन खिलजी ने परमार शासन समाप्त किया
  • बाद में 1514 में महमूद शाह खिलजी द्वितीय के समय इसे मस्जिद में परिवर्तित करने का प्रयास हुआ
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परिसर में आज भी मंदिर वास्तुकला के स्तंभ, नक्काशीदार छत और शिलालेख मौजूद बताए जाते हैं।


कानूनी महत्व

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का कानूनी महत्व यह है कि:

  1. सुप्रीम कोर्ट ने मामले के मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं की
  2. हाईकोर्ट को ही तथ्य और साक्ष्य पर अंतिम निर्णय लेने दिया
  3. ASI रिपोर्ट और वीडियोग्राफी इस मामले में महत्वपूर्ण साक्ष्य होंगे
  4. दोनों पक्षों को आपत्तियां दर्ज करने का पूरा अवसर मिलेगा

यह मामला धार्मिक स्थल, पुरातत्व, इतिहास और संपत्ति अधिकारों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और सिविल विवाद है।


निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने भोजशाला–कमाल मौला मस्जिद विवाद में हस्तक्षेप करने के बजाय मध्य प्रदेश हाईकोर्ट को ही सभी आपत्तियों और साक्ष्यों पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार दिया है। अब इस विवाद का अगला महत्वपूर्ण चरण हाईकोर्ट की अंतिम सुनवाई और संभावित साइट विजिट के बाद तय होगा।


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