मनी लॉन्ड्रिंग केस में सुकेश चंद्रशेखर को जमानत, कोर्ट ने कहा—अनिश्चित हिरासत असंवैधानिक

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दिल्ली की अदालत ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में सुकेश चंद्रशेखर को जमानत देते हुए कहा कि लंबी हिरासत Article 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शीघ्र सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन है।


लंबी हिरासत पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

दिल्ली की एक अदालत ने कथित ठग सुकेश चंद्रशेखर को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जमानत दे दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी आरोपी को अनिश्चितकाल तक हिरासत में रखना उसके मौलिक अधिकारों—विशेष रूप से व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शीघ्र सुनवाई के अधिकार—का उल्लंघन है।

कोर्ट ने कहा कि जब ट्रायल के जल्द समाप्त होने की संभावना नहीं हो, तो आरोपी को अनावश्यक रूप से जेल में रखना न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।


BNSS की धारा 479 के तहत मिली राहत

अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 479 के तहत याचिका स्वीकार करते हुए सुकेश चंद्रशेखर को ₹5 लाख के निजी मुचलके और समान राशि के जमानतदारों पर रिहा करने का आदेश दिया।

साथ ही, अदालत ने कुछ कड़ी शर्तें भी लगाईं—जैसे कि वह किसी गवाह से संपर्क नहीं करेगा, अपना पता और मोबाइल नंबर साझा करेगा, पासपोर्ट जमा करेगा और विदेश यात्रा से पहले अदालत की अनुमति लेगा।


‘जमानत देना अनिवार्य’—कोर्ट का स्पष्ट रुख

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि BNSS की धारा 479 में प्रयुक्त शब्द “shall be released” इसे अनिवार्य प्रकृति प्रदान करता है।

हालांकि कुछ अपवाद संभव हैं, लेकिन अदालत ने कहा कि इन अपवादों का उपयोग इस प्रकार नहीं किया जा सकता कि वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मूल सिद्धांत को ही निष्प्रभावी कर दें।

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आधी सजा से अधिक अवधि जेल में बिता चुके थे आरोपी

अदालत ने यह भी नोट किया कि सुकेश चंद्रशेखर पहले ही उस अधिकतम सजा (7 वर्ष) के आधे से अधिक समय जेल में बिता चुके हैं, जो प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत निर्धारित है।

इसके अलावा, अदालत ने यह भी माना कि संबंधित मूल (predicate) अपराध की कार्यवाही फिलहाल स्थगित है, जिससे ट्रायल के शीघ्र समाप्त होने की संभावना और भी कम हो जाती है।


ईडी की आपत्तियां खारिज

प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से जमानत का विरोध किया गया था, लेकिन अदालत ने इसे खारिज कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि केवल आरोपों की गंभीरता या कई मामलों का लंबित होना अपने आप में जमानत से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता। हर मामले का मूल्यांकन उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।


Article 21 और शीघ्र सुनवाई का अधिकार दोहराया

अदालत ने Vijay Madanlal Choudhary v. Union of India फैसले का हवाला देते हुए कहा कि शीघ्र सुनवाई का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 का अभिन्न हिस्सा है।

कोर्ट ने कहा कि बिना ट्रायल में प्रगति के लंबी हिरासत, सजा से पहले ही दंड देने के समान है, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है।


ECI रिश्वत मामले से जुड़ा है केस

यह मामला उन आरोपों से जुड़ा है, जिनमें कहा गया है कि सुकेश चंद्रशेखर ने एआईएडीएमके पार्टी के चुनाव चिन्ह विवाद के संबंध में Election Commission of India को प्रभावित करने के लिए रिश्वत देने की कोशिश में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। इस कथित अपराध में लगभग ₹2 करोड़ की धनराशि शामिल बताई गई है।

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‘Trial by incarceration’ पर अदालत की चेतावनी

अदालत ने अपने फैसले में “trial by incarceration” (हिरासत के माध्यम से ट्रायल) के खिलाफ भी चेतावनी दी।

कोर्ट ने कहा कि विशेष कानून जैसे PMLA भी संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों को कमजोर नहीं कर सकते। व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोच्च महत्व देते हुए अदालत ने कहा कि गंभीर आर्थिक अपराधों में भी संवैधानिक सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।


निष्कर्ष: व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि

यह फैसला स्पष्ट करता है कि भारतीय न्याय व्यवस्था में व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है। अदालत ने दोहराया कि न्याय प्रक्रिया का उद्देश्य सजा से पहले दंड देना नहीं, बल्कि निष्पक्ष और समयबद्ध ट्रायल सुनिश्चित करना है।


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