इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल की मस्जिद शरीफ गौसुलबरा राया बुर्जुग के ध्वस्तीकरण पर रोक लगाने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता पहले वैकल्पिक उपाय अपनाएं। मामला तालाब की भूमि पर अवैध निर्माण से जुड़ा है।
मस्जिद ध्वस्तीकरण मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप से किया इनकार, कहा- वैकल्पिक उपाय उपलब्ध
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल जिले में स्थित मस्जिद शरीफ गौसुलबरा राया बुर्जुग के ध्वस्तीकरण पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर हस्तक्षेप से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि याची को पहले उपलब्ध वैकल्पिक उपायों का सहारा लेना चाहिए, न कि सीधे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए।
यह आदेश न्यायमूर्ति दिशेश पाठक और न्यायमूर्ति गौरीशंकर राय की खंडपीठ ने पारित किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 67(5) के तहत वैकल्पिक उपाय मौजूद हैं, जिनका प्रयोग किए बिना सीधे न्यायिक हस्तक्षेप की मांग स्वीकार्य नहीं है।
🏛️ याचिका और पक्षकारों की दलीलें
मस्जिद के मुतवल्ली समेत अन्य लोगों ने याचिका दाखिल कर कोर्ट से अनुरोध किया था कि प्रशासन द्वारा की जा रही कार्रवाई पर रोक लगाई जाए। उनका तर्क था कि मस्जिद को ध्वस्त करने की कार्रवाई मनमानी और धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है।
राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता कुमार मयंक त्रिपाठी और एडिशनल एडवोकेट जनरल आशीष मिश्रा ने पैरवी की। उन्होंने तर्क दिया कि यह मामला राजस्व भूमि विवाद से संबंधित है, और इस पर प्रशासन ने वैधानिक प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की है।
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि पहले याची को राजस्व न्यायालय या सक्षम प्राधिकारी के समक्ष वैकल्पिक उपाय अपनाने चाहिए थे। कोर्ट ने कहा,
“जब वैकल्पिक न्यायिक उपाय उपलब्ध हों, तब सीधे उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप उचित नहीं ठहराया जा सकता।”
🏗️ पृष्ठभूमि — मस्जिद और विवादित भूमि का मामला
संभल जिले के राया बुर्जुग गांव में स्थित मस्जिद शरीफ गौसुलबरा राया बुर्जुग को प्रशासन ने तालाब की भूमि पर अवैध निर्माण बताते हुए ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की थी। तहसीलदार धीरेश सिंह के नेतृत्व में नगर और राजस्व विभाग की संयुक्त टीम ने यह कार्रवाई की।
प्रशासन के अनुसार, यह निर्माण तालाब की 2,310 वर्गमीटर भूमि पर अवैध रूप से किया गया था। विभाग ने 552 वर्गमीटर क्षेत्र में बने ढांचे को अवैध मस्जिद बताया। इससे पहले प्रशासन ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर 15 दिन का समय दिया था, परन्तु कोई जवाब नहीं मिला।
⚖️ अदालत की टिप्पणियाँ
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता पहले राजस्व उपायों का सहारा लें और वहां से राहत न मिलने पर ही उच्च न्यायालय का रुख करें। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर दखल देना न्यायिक अनुशासन के विरुद्ध होगा।
“न्यायालय यह नहीं कहता कि याचिकाकर्ताओं के अधिकारों का उल्लंघन हुआ या नहीं। लेकिन पहले वैधानिक उपायों को पूरा किया जाना आवश्यक है,” कोर्ट ने कहा।
📜 प्रशासन की अगली कार्रवाई
हाईकोर्ट के निर्णय के बाद प्रशासन ने कहा कि अवैध निर्माण के खिलाफ अभियान जारी रहेगा। तहसील प्रशासन ने स्थानीय लोगों को चेतावनी दी है कि सरकारी या तालाब की भूमि पर किसी भी प्रकार का अवैध निर्माण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
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