पत्नी नौकरीपेशा हो तब भी भरण-पोषण से इंकार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 का उद्देश्य पत्नी को सम्मानजनक जीवन देना है। गाजियाबाद परिवार न्यायालय के 15,000 रुपये मासिक भरण-पोषण आदेश को चुनौती देने वाली पति की पुनरीक्षण याचिका खारिज।

प्रयागराज: Allahabad High Court ने स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 केवल पत्नी को आर्थिक संकट से बचाने का प्रावधान नहीं है, बल्कि उसे पति की हैसियत के अनुरूप सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार भी सुनिश्चित करती है। न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकल पीठ ने गाजियाबाद परिवार न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली पति की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।

मामला उस आदेश से जुड़ा था, जिसमें गाजियाबाद परिवार न्यायालय के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश ने पति को आवेदन की तिथि से पत्नी को 15,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया था। पति ने इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।

पति की दलीलें

पति की ओर से तर्क दिया गया कि पत्नी शिक्षित, नौकरीपेशा और आर्थिक रूप से स्वतंत्र है। समर्थन में मई 2018 का आयकर रिटर्न प्रस्तुत किया गया, जिसमें पत्नी की वार्षिक आय 11,28,780 रुपये दर्शाई गई थी। यह भी कहा गया कि पत्नी ने स्वेच्छा से वैवाहिक घर छोड़ा और वैवाहिक दायित्व निभाने को तैयार नहीं थी।

पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी ने वृद्ध सास-ससुर के साथ रहने से इनकार किया, जिसके कारण उसे बीमार माता-पिता की देखभाल के लिए नौकरी छोड़नी पड़ी। उसने दावा किया कि वह आर्थिक दायित्वों के दबाव में है और भरण-पोषण देने में असमर्थ है।

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पत्नी का पक्ष

पत्नी की ओर से कहा गया कि पति ने अपनी वास्तविक आय और जीवन स्तर को न्यायालय से छिपाया है। निचली अदालत में दिए गए बयान के अनुसार, पति अप्रैल 2018 से अप्रैल 2020 के बीच जेपी मॉर्गन में कार्यरत था और उसका वार्षिक पैकेज लगभग 40 लाख रुपये था।

पत्नी ने तर्क दिया कि उसका नौकरी करना भरण-पोषण से इनकार का आधार नहीं हो सकता, विशेषकर तब जब दोनों की आय और सामाजिक-आर्थिक स्थिति में स्पष्ट और गंभीर अंतर हो।

हाईकोर्ट की टिप्पणी

उच्च न्यायालय ने पाया कि पति ने अपनी आय में कमी आने का कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया। अदालत ने कहा कि पत्नी की जो आय रिकॉर्ड पर है, उसे इतना पर्याप्त नहीं माना जा सकता कि वह वैवाहिक जीवन के दौरान जिस जीवन स्तर की अभ्यस्त थी, उसी स्तर पर जीवनयापन कर सके।

अदालत ने दोहराया कि धारा 125 सीआरपीसी का उद्देश्य केवल भुखमरी या दीन-हीन स्थिति से बचाना नहीं है, बल्कि पत्नी को सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराना है। केवल इस आधार पर कि पत्नी कुछ आय अर्जित करती है या नौकरी करती है, उसे भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता।

कानूनी महत्व

यह फैसला भरण-पोषण संबंधी मामलों में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को रेखांकित करता है—पति की आय, सामाजिक स्थिति और जीवन स्तर की तुलना में पत्नी की आय का वास्तविक प्रभाव देखा जाएगा। यदि पत्नी की आय पति के स्तर की तुलना में अपर्याप्त है, तो उसे भरण-पोषण का अधिकार बना रहेगा।

अदालत ने स्पष्ट किया कि पति का यह दायित्व तब तक समाप्त नहीं होता जब तक वह यह साबित न कर दे कि पत्नी स्वयं उसी स्तर का जीवनयापन करने में सक्षम है, जैसा वह वैवाहिक जीवन के दौरान करती थी।

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इस प्रकार, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए पति की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।


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