“जज भी हाड़-मांस के नश्वर प्राणी”
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलीय अदालतें अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों के विरुद्ध अपमानजनक टिप्पणियां न दर्ज करें। शामली उपभोक्ता आयोग अध्यक्ष हेमंत कुमार गुप्ता के खिलाफ की गई टिप्पणियां रद्द।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की नसीहत: अपीलीय अदालतें अधीनस्थ न्यायालयों पर अपमानजनक टिप्पणी से बचें, “न्यायिक संयम” अनिवार्य
इलाहाबाद | न्यायपालिका रिपोर्ट | 2025 — इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि अपीलीय न्यायालयों का उद्देश्य अधीनस्थ अदालतों की विधिक त्रुटियों को सुधारना है, न कि उन पर अपमानजनक या अनावश्यक टिप्पणियां करना। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अपीलीय शक्तियों का प्रयोग करते समय सावधानी, संयम और मर्यादा आवश्यक है।
न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए शामली जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष हेमंत कुमार गुप्ता के विरुद्ध अपीलीय न्यायालय द्वारा की गई कठोर टिप्पणियों को निरस्त कर दिया।
मामला क्या था?
याचिकाकर्ता हेमंत कुमार गुप्ता, शामली जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष, द्वारा दिए गए दो आदेशों पर अपीलीय न्यायालय ने प्रतिकूल व तीखी टिप्पणी की थी।
इसके खिलाफ उन्होंने पहले राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग, और बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण अवलोकन
1. अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों पर अनावश्यक टिप्पणी अनुचित
हाईकोर्ट ने कहा:
- अपीलीय न्यायालय को मिली शक्तियां केवल विधिक गलतियों को सुधारने के लिए हैं।
- अधीनस्थ न्यायाधीशों के विरुद्ध अपमानजनक, अवमाननापूर्ण या तीखी टिप्पणियों का कोई औचित्य नहीं।
- न्यायिक अधिकारियों को लक्ष्य बनाकर टिप्पणी करना न्यायिक अनुशासन और गरिमा के खिलाफ है।
2. टिप्पणी तभी हो जब “निर्णय के लिए अनिवार्य”
न्यायालय ने कहा कि किसी व्यक्ति या प्राधिकारी के आचरण पर टिप्पणी तभी की जानी चाहिए, जब:
- वह निर्णय के लिए अत्यंत आवश्यक हो,
- और उसे पहले सुनवाई का अवसर दिया गया हो।
इस मामले में अपीलीय अदालत ने ऐसा अवसर नहीं दिया था, इसलिए टिप्पणी को अवैध माना गया।
3. “जज भी हाड़-मांस के नश्वर प्राणी”
न्यायालय ने कहा कि:
न्यायाधीश भी इंसान हैं, अतः न्यायिक संयम और मर्यादा आवश्यक है।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश फेलिक्स फ्रैंकफर्टर का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
“विनम्रता, निःस्वार्थता और नीति व इतिहास के आलोक में सर्वोत्तम निर्णय तक पहुंचने का प्रयास न्यायाधीश का मूल कर्तव्य है।”
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
हाईकोर्ट ने निम्न निर्णयों का उल्लेख किया:
- बृज किशोर ठाकुर बनाम भारत संघ — अपमानजनक टिप्पणियों से बचने की अनिवार्यता
- अवनी कुमार उपाध्याय बनाम इलाहाबाद हाईकोर्ट — न्यायिक अधिकारी पर किसी टिप्पणी से पूर्व सुनवाई का अधिकार आवश्यक
- अन्य न्यायिक सेवा आचरण से जुड़े मामले
कोर्ट ने कहा कि उच्च न्यायालयों का दायित्व केवल त्रुटियों को सुधारना है, न कि अधीनस्थ न्यायाधीशों का अपमान करना।
अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने:
- अपीलीय अदालत की सभी अपमानजनक टिप्पणियों को रद्द कर दिया,
- और याचिका को स्वीकार कर लिया।
यह निर्णय न्यायिक मर्यादा, अनुशासन और अपीलीय समीक्षा की सीमाओं पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी माना जा रहा है।
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