‘खराब हेयरकट’ पर ₹2 करोड़ मुआवज़ा नहीं टिकेगा: सबूत के बिना हर्जाना नहीं — सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने ITC Limited बनाम आशना रॉय मामले में NCDRC द्वारा दिए गए ₹2 करोड़ मुआवज़े को घटाकर ₹25 लाख कर दिया। कोर्ट ने कहा कि उपभोक्ता मामलों में भारी भरकम मुआवज़ा केवल अनुमान, अप्रमाणित दस्तावेज़ों या शिकायतकर्ता की इच्छाओं के आधार पर नहीं दिया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उपभोक्ता विवादों में मुआवज़े की गणना, विशेष रूप से जब दावा करोड़ों रुपये का हो, तो वह केवल विश्वसनीय, प्रमाणित और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्यों पर ही आधारित हो सकती है। महज़ फोटोस्टेट दस्तावेज़ों, अनुमान, अटकलों या शिकायतकर्ता की “whims and fancies” के आधार पर भारी भरकम मुआवज़ा नहीं दिया जा सकता।

न्यायमूर्ति मनमोहन और न्यायमूर्ति राजेश बिंदल की पीठ ने ITC Limited की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (NCDRC) के आदेश में संशोधन किया और मुआवज़े की राशि ₹2 करोड़ से घटाकर ₹25 लाख कर दी, जो पहले ही उत्तरदाता को जारी की जा चुकी थी।

तथ्यात्मक पृष्ठभूमि

12 अप्रैल 2018 को उत्तरदाता आशना रॉय नई दिल्ली स्थित ITC मौर्य होटल के ब्यूटी सैलून में हेयरकट के लिए गई थीं। उनका आरोप था कि निर्देश के विपरीत उनके बाल अत्यधिक छोटे काट दिए गए, जिससे उन्हें मानसिक आघात पहुँचा और उनके पेशेवर करियर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

इसके बाद जुलाई 2018 में उन्होंने NCDRC के समक्ष उपभोक्ता शिकायत दाखिल की। 21 सितंबर 2021 के आदेश में NCDRC ने होटल को सेवा में कमी (deficiency in service) और चिकित्सीय लापरवाही का दोषी ठहराते हुए ₹2 करोड़ का मुआवज़ा प्रदान किया।

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पहला दौर: सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप

इस आदेश को ITC Limited ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 7 फरवरी 2023 के निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने सेवा में कमी के निष्कर्ष को बरकरार रखा, लेकिन मुआवज़े की राशि को यह कहते हुए निरस्त कर दिया कि उत्तरदाता द्वारा अपने दावे को सिद्ध करने के लिए कोई ठोस सामग्री रिकॉर्ड पर नहीं रखी गई थी।

मामले को केवल मुआवज़े की राशि पर पुनर्विचार के लिए NCDRC को वापस भेजा गया और दोनों पक्षों को साक्ष्य पेश करने व उनका खंडन करने की अनुमति दी गई।

रिमांड के बाद क्या हुआ?

रिमांड के बाद उत्तरदाता ने अपना दावा बढ़ाकर ₹5.20 करोड़ कर दिया और 21 फरवरी 2023 को एक हलफनामा दाखिल किया। इसके साथ ई-मेल, कथित मॉडलिंग ऑफर, प्रमाणपत्र, विज्ञापन, चिकित्सकीय पर्चे और वेतन पर्चियों की फोटोस्टेट प्रतियां संलग्न की गईं।

हालाँकि, 25 अप्रैल 2023 के आदेश में NCDRC ने एक बार फिर ₹2 करोड़ का मुआवज़ा 9% ब्याज सहित प्रदान कर दिया, जिसके खिलाफ ITC Limited ने वर्तमान अपील दाखिल की।

विचारणीय प्रश्न

  • क्या केवल फोटोस्टेट और अप्रमाणित दस्तावेज़ों के आधार पर ₹2 करोड़ का मुआवज़ा दिया जा सकता था?
  • क्या शिकायतकर्ता और दस्तावेज़ों के लेखकों से जिरह का अवसर न देकर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ?
  • क्या उत्तरदाता ने ऐसा कोई कानूनी रूप से मान्य नुकसान सिद्ध किया, जो इस स्तर के मुआवज़े को उचित ठहराता हो?

पक्षकारों की दलीलें

ITC Limited ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेश के बावजूद उत्तरदाता कोई भी स्वीकार्य साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रही। सभी दस्तावेज़ फोटोस्टेट थे, मूल प्रतियाँ पेश नहीं की गईं, न ही उनके लेखकों की गवाही कराई गई। स्वयं उत्तरदाता भी गवाह के रूप में पेश नहीं हुईं, जिससे जिरह का अधिकार प्रभावित हुआ।

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वेतन पर्चियों से यह स्पष्ट था कि हेयरकट से पहले और बाद में उनकी नौकरी और वेतन समान रहा। कथित मॉडलिंग और फिल्म ऑफर अस्पष्ट, बिना तारीख के और भुगतान के किसी प्रमाण के बिना थे, जिनका हेयरकट से कोई प्रत्यक्ष संबंध स्थापित नहीं होता।

दूसरी ओर, उत्तरदाता ने कहा कि उनका आत्मविश्वास और पेशेवर करियर अपूरणीय रूप से क्षतिग्रस्त हुआ है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि उपभोक्ता मंच तकनीकी कठोरताओं से मुक्त होते हैं और वर्षों की मुकदमेबाज़ी के बाद मुआवज़ा न देना घोर अन्याय होगा।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

कोर्ट ने पाया कि रिमांड के बाद भी उत्तरदाता द्वारा प्रस्तुत सभी दस्तावेज़ केवल फोटोस्टेट प्रतियाँ थीं। न तो उनके लेखकों की परीक्षा कराई गई और न ही आयोग के माध्यम से उनका परीक्षण कराने का कोई प्रयास किया गया।

कोर्ट ने दोहराया कि यद्यपि उपभोक्ता मामलों में भारतीय साक्ष्य अधिनियम के कठोर प्रावधान लागू नहीं होते, फिर भी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन अनिवार्य है।

पीठ ने कहा कि करोड़ों रुपये के मुआवज़े के दावे में इस प्रकार के अप्रमाणित दस्तावेज़ विश्वास पैदा नहीं करते। कई दस्तावेज़ हेयरकट से पहले के थे, कुछ वर्षों बाद के, और कोई भी हेयरकट तथा कथित पेशेवर नुकसान के बीच कारणात्मक संबंध स्थापित नहीं करता।

कोर्ट ने स्पष्ट किया:

“हर्जाना केवल अनुमानों या शिकायतकर्ता की इच्छाओं के आधार पर नहीं दिया जा सकता।”

यह कोई साधारण उपभोक्ता विवाद नहीं था, जहाँ मोटे तौर पर मुआवज़ा तय किया जा सके। असाधारण रूप से बड़े दावे के लिए विश्वसनीय और ठोस साक्ष्य आवश्यक थे, जो इस मामले में पूरी तरह अनुपस्थित थे।

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अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने ITC Limited की अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए NCDRC के आदेश में संशोधन किया और मुआवज़े की राशि को ₹25 लाख तक सीमित कर दिया, जो पहले ही उत्तरदाता को जारी की जा चुकी थी।

मामले का नाम: ITC Limited बनाम आशना रॉय
सिविल अपील संख्या: 3318 of 2023


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