फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी से खरीदी संपत्ति अवैध: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना पंजीकृत और सिद्ध पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर की गई अचल संपत्ति की बिक्री कानूनन मान्य नहीं है और ऐसी खरीद से स्वामित्व अधिकार उत्पन्न नहीं होते।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम निर्णय में कहा है कि फर्जी अथवा अप्रमाणित पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर खरीदी गई संपत्ति को वैध नहीं माना जा सकता। अदालत ने मकान खरीदार की अपील खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।
यह फैसला न्यायमूर्ति राकेश चंद्र सिंह बिसेन की एकलपीठ ने 24 वर्ष पुरानी अपील पर सुनवाई करते हुए दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले के अनुसार, हरदा निवासी जव्वार खान ने वर्ष 1997 में कथित रूप से पावर ऑफ अटॉर्नी के माध्यम से एक मकान खरीदा था। यह मकान सोना बाई के नाम दर्ज था, जिनका निधन 7 मार्च 1998 को हो गया।
जव्वार खान ने इस आधार पर—
- हरदा नगर पालिका में नामांतरण कराया
- और बाद में सोना बाई के दूसरे बेटे राजेन्द्र कुमार को संपत्ति से बेदखल करने के लिए
- सिविल कोर्ट में वाद दायर किया
हालाँकि, 5 जनवरी 2002 को हरदा के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने सिविल सूट खारिज कर दिया, जिसके खिलाफ यह अपील हाईकोर्ट में दाखिल की गई थी।
पावर ऑफ अटॉर्नी पर गंभीर खामियाँ
हाईकोर्ट ने पाया कि—
- जिस पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर बिक्री का दावा किया गया
- वह न तो न्यायालय में प्रस्तुत की गई
- और न ही उसके पंजीकरण का कोई प्रमाण दिया गया
यह भी सामने आया कि कथित पावर ऑफ अटॉर्नी धारक महेंद्र कुमार को गवाही के लिए पेश तक नहीं किया गया।
अदालत ने दो टूक कहा कि—
“₹2 लाख से अधिक मूल्य की अचल संपत्ति का विक्रय बिना पंजीकृत पावर ऑफ अटॉर्नी के कानूनी रूप से संभव ही नहीं है।”
स्वामित्व और कब्ज़े का दावा अस्वीकार
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि—
- अपीलकर्ता न तो संपत्ति पर अपना स्वामित्व सिद्ध कर सका
- और न ही कब्ज़ा खाली कराने का अधिकार स्थापित कर पाया
इस आधार पर अदालत ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।
कानूनी सिद्धांत की पुनः पुष्टि
यह फैसला एक बार फिर इस सिद्धांत को पुष्ट करता है कि—
- पावर ऑफ अटॉर्नी बिक्री का विकल्प नहीं है
- अचल संपत्ति का वैध हस्तांतरण
- केवल पंजीकृत विक्रय विलेख
- और विधिसम्मत दस्तावेज़ों से ही संभव है
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