‘महिला को हर महीने 3 दिन अछूत नहीं मान सकते’—सबरीमाला सुनवाई में जस्टिस नागरत्ना की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं को ‘अछूत’ मानना तर्कसंगत नहीं, अनुच्छेद 17 और अनुच्छेद 25 पर गहन बहस जारी।
सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट की अहम सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े ऐतिहासिक विवाद पर सुनवाई कर रही है। यह सुनवाई 2018 के उस फैसले की समीक्षा याचिकाओं पर हो रही है, जिसमें महिलाओं के प्रवेश पर आयु आधारित प्रतिबंध को हटाया गया था।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस पीठ में कई वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल हैं।
‘3 दिन अछूत, फिर नहीं’—जस्टिस नागरत्ना का सवाल
सुनवाई के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं के प्रवेश प्रतिबंध पर तीखी टिप्पणी की।
उन्होंने कहा कि यह समझ से परे है कि किसी महिला को हर महीने तीन दिन ‘अछूत’ माना जाए और चौथे दिन उसे सामान्य मान लिया जाए।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि इस संदर्भ में अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता उन्मूलन) की दलील को किस तरह लागू किया जाए, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन इस प्रकार का व्यवहार तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता।
सॉलिसिटर जनरल की आपत्ति
सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने 2018 के फैसले में अपनाए गए उस दृष्टिकोण का विरोध किया, जिसमें मासिक धर्म के आधार पर प्रतिबंध को अस्पृश्यता का एक रूप माना गया था।
उन्होंने कहा कि महिलाओं को ‘अछूत’ की तरह मानने का तर्क स्वीकार्य नहीं है और इस पर उन्हें कड़ी आपत्ति है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय समाज को पश्चिमी दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए।
सामाजिक बुराई बनाम धार्मिक प्रथा पर बहस
सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण प्रश्न उठा कि क्या किसी प्रथा को धार्मिक परंपरा का हिस्सा मानकर संरक्षित किया जा सकता है, यदि उसमें सामाजिक बुराई के तत्व मौजूद हों।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यदि कोई प्रथा सामाजिक बुराई है, तो अदालत उसे धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे में नहीं रख सकती। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने जवाब दिया कि ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ (essential religious practice) का प्रश्न अलग है, लेकिन यदि सामाजिक बुराई सिद्ध होती है, तो हस्तक्षेप संभव है।
अनुच्छेद 25 और संतुलन की बात
जस्टिस नागरत्ना ने अनुच्छेद 25 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रावधान मौजूदा धार्मिक प्रथाओं और भविष्य में सुधार के बीच संतुलन स्थापित करता है।
उन्होंने कहा कि संविधान जहां धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है, वहीं सुधार के लिए विधायिका को भी भूमिका देता है।
2018 के फैसले की पृष्ठभूमि
28 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर आयु आधारित प्रतिबंध को असंवैधानिक घोषित कर दिया था।
इस फैसले में केरल हिंदू पब्लिक वर्शिप रूल्स, 1965 के उस प्रावधान को भी रद्द किया गया था, जो परंपरा के आधार पर महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकता था।
निष्कर्ष: समानता बनाम आस्था की संवैधानिक कसौटी
सबरीमाला मामला भारतीय संविधान के तहत समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सुधार के बीच संतुलन की जटिल बहस को दर्शाता है।
जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी इस बहस को और गहराई देती है, जहां सवाल केवल धार्मिक प्रथा का नहीं, बल्कि महिलाओं की गरिमा और समानता के अधिकार का भी है।
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