Derogatory comments against judiciary on social media intolerable: Madras High Court warns lawyer
मद्रास हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: जजों पर जातिगत आरोप न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला, अनुच्छेद 19 के तहत नहीं
मद्रास उच्च न्यायालय ने सोशल मीडिया पर न्यायपालिका और न्यायाधीशों के खिलाफ जातिगत और सांप्रदायिक आरोपों पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में न्यायपालिका को बदनाम करने की छूट नहीं दी जा सकती। यह टिप्पणी एक अवमानना (contempt of court) से जुड़े मामले में आई है, जिसमें अधिवक्ता एस. वंचिनाथन ने बार-बार न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन पर सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर जातिगत पक्षपात के आरोप लगाए।
⚖️ कोर्ट की टिप्पणियाँ
न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति के. राजसेकर की खंडपीठ ने कहा:
“न्यायिक स्वतंत्रता संविधान की मूलभूत विशेषता है। हमने निष्पक्ष रूप से न्याय करने की शपथ ली है… सार्वजनिक विमर्श की भी एक लक्ष्मण रेखा होती है, और उसे पार करना घातक है।”
कोर्ट ने वंचिनाथन के साक्षात्कारों और वीडियो को खुली अदालत में देखा, जिनमें उन्होंने न्यायिक आदेशों को जातिगत और धार्मिक पक्षपात से प्रेरित बताया था। अधिवक्ता को समन करने के बावजूद उन्होंने आरोपों को स्पष्ट करने से इनकार कर दिया और मीडिया में बयानबाजी जारी रखी।
⚖️ न्यायालय ने क्या कहा?
- यह व्यवहार पेशेवर आचरण के खिलाफ है, और बार काउंसिल द्वारा पहले निलंबित किए गए वकील के लिए और भी अधिक गंभीर है।
- अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अवमानना से संरक्षण नहीं देती जब उसका उद्देश्य न्यायिक प्रणाली को नीचा दिखाना हो।
- पूर्व न्यायाधीशों और वरिष्ठ वकीलों द्वारा विचाराधीन मामलों पर सार्वजनिक टिप्पणी करना भी अनुचित बताया गया, जिसे कोर्ट ने “उपेक्षा योग्य” कहा।
- मीडिया हाउसेज़, जो ऐसे विवादों से लाभ उठाते हैं, को भी कोर्ट ने चेतावनी दी कि इस प्रकार के कृत्यों को सीधे चुनौती दी जाएगी।
🧑⚖️ कानूनी आधार
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट और केरल हाईकोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि:
“जजों पर पक्षपात और अनुचित मंशा के आरोप न्यायिक अखंडता को कमजोर करते हैं और इससे जनता का विश्वास खत्म होता है।”
📌 आगे की कार्रवाई
कोर्ट ने आदेश दिया कि पूरा मामला मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भेजा जाए, क्योंकि आगे की कार्यवाही का निर्णय लेने का अधिकार केवल मुख्य न्यायाधीश को है।
कोर्ट ने दो टूक कहा:
“कोर्ट की प्रक्रिया सार्वजनिक दबाव से नहीं, बल्कि प्रक्रियात्मक नियमों से संचालित होती है।”
🚫 अंतिम चेतावनी
अंत में, न्यायालय ने कहा कि व्यक्तिगत या राजनीतिक उद्देश्य से न्यायपालिका को बदनाम करने के किसी भी प्रयास को शून्य सहिष्णुता (zero tolerance) के साथ निपटाया जाएगा।
मामला: Dr. D. Vetrichelvan v. The Tamil University & Ors.
न्यायाधीश: जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस के. राजसेकर
