आज UGC गाइडलाइंस, तब मंडल: जब 1990 में आरक्षण ने देश को हिला दिया

इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992): 9 जजों का फैसला जिसने भारत की सामाजिक दिशा तय की

यूजीसी की नई गाइडलाइंस पर देशव्यापी विरोध के बीच याद कीजिए 1990 का मंडल आंदोलन। सुप्रीम कोर्ट के 1992 के ऐतिहासिक इंदिरा साहनी फैसले में 9 जजों की पीठ ने क्या कहा, कौन से जज थे और कैसे तय हुई भारत की आरक्षण नीति—पूरी कहानी।

आज UGC गाइडलाइंस, तब मंडल: जब 1990 में आरक्षण ने देश को हिला दिया


आज जैसा माहौल, वैसा ही उबाल 1990 में भी था

आज देशभर में UGC की नई गाइडलाइंस को लेकर जो घमासान मचा हुआ है—सड़क पर उतरते छात्र, विरोध-प्रदर्शन, राजनीतिक बयानबाज़ी और सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम स्टे—वैसा ही माहौल भारत ने 1990–92 के दौर में देखा था।

जब तत्कालीन वी.पी. सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करते हुए केंद्र सरकार की नौकरियों में OBC को 27% आरक्षण देने का फैसला किया, तो इसे एक “सामाजिक बम” कहा गया।
देश में अभूतपूर्व प्रदर्शन हुए, आत्मदाह की घटनाएँ हुईं, प्रशासनिक तंत्र हिल गया और अंततः मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।


सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

इस ऐतिहासिक विवाद को सुप्रीम कोर्ट ने 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ को सौंपा।
मामला दर्ज हुआ—

इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992)

पीठ की अध्यक्षता तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एम.एच. कनिया ने की।


फैसला: 6 : 3 के बहुमत से मंडल बरकरार

16 नवंबर 1992 को सुप्रीम कोर्ट ने 6:3 के बहुमत से मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के सरकार के फैसले को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया—हालाँकि कुछ महत्वपूर्ण सीमाओं और शर्तों के साथ।

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🟢 समर्थन में रहे 6 न्यायाधीश

इन न्यायाधीशों ने OBC को 27% आरक्षण देने के फैसले को वैध माना:

  1. न्यायमूर्ति एम.एच. कनिया (CJI)
  2. न्यायमूर्ति एम.एन. वेंकटचलय्या
  3. न्यायमूर्ति ए.एम. अहमदी
  4. न्यायमूर्ति पी.बी. सावंत
  5. न्यायमूर्ति बी.पी. जीवन रेड्डी
    👉 इन्होंने बहुमत का मुख्य फैसला लिखा
    👉 इन्हें “आरक्षण न्यायशास्त्र की दिशा बदलने वाला जज” कहा जाता है
  6. न्यायमूर्ति एस. रत्नवेल पांडियन
    👉 इन्होंने आरक्षण के समर्थन में अलग लेकिन सहमति वाली राय दी

📌 जस्टिस बी.पी. जीवन रेड्डी का फैसला आज भी भारत की आरक्षण नीति का सबसे मजबूत कानूनी आधार माना जाता है।


🔴 विरोध में रहे 3 न्यायाधीश

तीन जजों ने मंडल आरक्षण का विरोध किया:

  • न्यायमूर्ति के.जे. शेट्टी
  • न्यायमूर्ति आर.एम. सहाय
  • न्यायमूर्ति टी.के. थॉमन

इनका मानना था कि:

  • जाति को पिछड़ेपन का अकेला आधार नहीं बनाया जा सकता
  • इससे समानता और मेरिट को नुकसान पहुँचेगा

इंदिरा साहनी कौन थीं?

इंदिरा साहनी एक वकील और सामाजिक कार्यकर्ता थीं, जिनका नाम मंडल आरक्षण के खिलाफ दायर ऐतिहासिक याचिका से जुड़ा है।

  • दिल्ली निवासी
  • 1 अक्टूबर 1990 को वी.पी. सिंह सरकार के 27% OBC आरक्षण फैसले को असंवैधानिक बताते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुँचीं
  • बाद में पी.वी. नरसिंह राव सरकार द्वारा लाए गए 10% आर्थिक आरक्षण को भी चुनौती दी

उनकी याचिका पर ही सुप्रीम कोर्ट ने:

  • 50% आरक्षण सीमा
  • क्रीमी लेयर सिद्धांत
  • OBC के लिए प्रमोशन में आरक्षण पर रोक
    जैसे ऐतिहासिक सिद्धांत स्थापित किए।

आज वे सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और आरक्षण नीति पर चर्चित आवाज़ रही हैं।


क्या मंडल कमीशन कांग्रेस ने बनाया था?

नहीं।

मंडल आयोग का गठन:

  • दिसंबर 1978 में जनता पार्टी सरकार ने किया
  • प्रधानमंत्री थे मोरारजी देसाई
  • 1 जनवरी 1979 को अधिसूचना जारी कर
  • बी.पी. मंडल को आयोग का अध्यक्ष बनाया गया
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मंडल आयोग के प्रमुख सदस्य

  1. बी.पी. मंडल – बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री, आयोग अध्यक्ष
    • पिछड़ेपन की पहचान के लिए 11 सामाजिक–आर्थिक मानक बनाए
  2. न्यायमूर्ति आर.आर. भोले – बॉम्बे हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज
    • सिफारिशों को संवैधानिक आधार दिया
  3. दीवान मोहन लाल – वरिष्ठ राजनेता व वकील
  4. के. सुब्रमण्यम – दक्षिण भारत के अनुभवी प्रशासक
  5. एल.आर. नायक – पूर्व सांसद, ‘अति-पिछड़ों’ के लिए अलग आरक्षण की वकालत
  6. एस.एस. गिल (IAS) – आयोग के सदस्य-सचिव

वी.पी. सिंह ने इसे कैसे और क्यों लागू किया?

  • 1989 के चुनाव में जनता दल ने OBC आरक्षण का वादा किया
  • 7 अगस्त 1990 को इसे 27% आरक्षण के रूप में लागू किया

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार:

  • यह केवल सामाजिक न्याय नहीं
  • बल्कि “मंडल बनाम कमंडल” की राजनीति भी थी
  • भाजपा राम मंदिर आंदोलन के जरिए हिंदू एकता (कमंडल) की राजनीति कर रही थी
  • मंडल ने पिछड़ी जातियों को गोलबंद कर इस राजनीति को चुनौती दी

कुछ ही समय बाद:

  • भाजपा ने समर्थन वापस लिया
  • वी.पी. सिंह सरकार गिर गई

लागू होने में देरी क्यों हुई?

  • फैसला 1990 में घोषित हुआ
  • लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया
  • कोर्ट ने अस्थायी रोक लगा दी

👉 16 नवंबर 1992 को फैसला आया
👉 सितंबर 1993 में पी.वी. नरसिंह राव सरकार के दौरान इसे पूरी तरह लागू किया गया


आज के संदर्भ में क्यों प्रासंगिक है मंडल फैसला?

आज जब:

  • UGC रेगुलेशन
  • आरक्षण बनाम मेरिट
  • सामाजिक न्याय बनाम समानता
    पर बहस छिड़ी है,

तो इंदिरा साहनी फैसला याद दिलाता है कि:

भारत में बड़े सामाजिक बदलाव अक्सर सड़क से सुप्रीम कोर्ट तक जाते हैं—और अंत में संविधान संतुलन बनाता है।


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