तिरुपति लड्डू घी जांच: सुप्रीम कोर्ट ने स्वामी की याचिका खारिज की

तिरुपति मंदिर में प्रसादम लड्डू के घी में कथित मिलावट मामले में – एसआईटी द्वारा दायर चार्जशीट पर आपराधिक मुकदमा अपने निर्धारित मार्ग पर आगे बढ़ेगा

सुप्रीम कोर्ट ने तिरुमला के तिरुपति मंदिर में प्रसादम लड्डू के घी में कथित मिलावट मामले में एक-सदस्यीय समिति पर रोक लगाने की मांग खारिज की। कोर्ट ने कहा—आपराधिक जांच और प्रशासनिक समीक्षा साथ-साथ चल सकती हैं।

देश के प्रतिष्ठित Tirupati Temple में प्रसादम लड्डू के लिए इस्तेमाल किए गए घी में कथित मिलावट को लेकर दायर याचिका पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया। अदालत ने भाजपा नेता Subramanian Swamy की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा गठित एक-सदस्यीय समिति को चुनौती दी गई थी।

याचिका में तर्क दिया गया था कि जब सर्वोच्च न्यायालय पहले ही विशेष जांच दल (SIT) की जांच का आदेश दे चुका है और मामला न्यायालय के विचाराधीन है, तब राज्य सरकार समानांतर जांच प्रक्रिया शुरू नहीं कर सकती। स्वामी का कहना था कि यह समिति चल रही आपराधिक कार्यवाही के साथ ‘ओवरलैप’ करेगी।

कोर्ट का स्पष्ट संदेश: दो प्रक्रियाएं, अलग दायरा

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस दलील को अस्वीकार करते हुए कहा कि प्रशासनिक जांच और आपराधिक मुकदमे की प्रकृति व उद्देश्य अलग-अलग हैं।

पीठ ने अपने आदेश में कहा, “ऐसी प्रशासनिक जांच को चार्जशीट आधारित आपराधिक कार्यवाही का ओवरलैप नहीं माना जा सकता। न तो हितों का टकराव है और न ही दायरे में भ्रम। दोनों प्रक्रियाएं कानून के अनुसार समानांतर चल सकती हैं।”

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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा गठित समिति का उद्देश्य प्रशासनिक चूक की पहचान करना, जिम्मेदारी तय करना और आवश्यक अनुशासनात्मक कदम सुझाना है, जबकि एसआईटी की जांच आपराधिक दायित्व तय करने तक सीमित है।

क्या है पूरा विवाद?

मामला तिरुमला में श्रद्धालुओं को वितरित किए जाने वाले ‘प्रसादम लड्डू’ के घी में कथित मिलावट से जुड़ा है। आरोप लगाए गए थे कि पूर्व वाईएसआरसीपी सरकार के कार्यकाल में प्रसाद की पवित्रता से समझौता किया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि 25 सितंबर 2024 को इस मामले में एफआईआर दर्ज हुई थी, जिसे बाद में न्यायालय के निर्देश पर एसआईटी को सौंप दिया गया। एसआईटी ने जांच पूरी कर चार्जशीट और पूरक चार्जशीट दाखिल कर दी है।

इसके समानांतर, आंध्र प्रदेश सरकार ने एक प्रशासनिक अभ्यास शुरू किया है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि संस्थागत स्तर पर कहां चूक हुई और किसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए।

स्वामी की आपत्ति क्यों खारिज हुई?

याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह था कि जब एसआईटी की जांच न्यायिक निगरानी में पूरी हो चुकी है, तब राज्य सरकार की समिति समानांतर जांच कर न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि दोनों प्रक्रियाओं के उद्देश्य भिन्न हैं—एक आपराधिक जवाबदेही तय करती है, जबकि दूसरी प्रशासनिक जवाबदेही। इसलिए समानांतर रूप से दोनों का संचालन कानून सम्मत है।

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व्यापक संकेत

यह फैसला स्पष्ट करता है कि आपराधिक जांच और प्रशासनिक समीक्षा परस्पर विरोधी नहीं हैं, बशर्ते उनके दायरे स्पष्ट रूप से निर्धारित हों। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप तभी माना जाएगा जब दो जांचों के बीच वास्तविक टकराव या हितों का संघर्ष हो।

इस निर्णय के साथ सुप्रीम कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि संवेदनशील धार्मिक मामलों में भी कानून के दायरे में बहु-स्तरीय जवाबदेही सुनिश्चित की जा सकती है।

याचिका खारिज होने के बाद अब एसआईटी द्वारा दायर चार्जशीट पर आपराधिक मुकदमा अपने निर्धारित मार्ग पर आगे बढ़ेगा, जबकि राज्य सरकार की एक-सदस्यीय समिति प्रशासनिक पहलुओं की समीक्षा जारी रखेगी।


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