‘The protector turned predator’: Supreme Court cancels bail of the officer in charge of the women protection home, orders to provide security to the victims
नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने पटना के एक महिला संरक्षण गृह की प्रभारी अधिकारी की ज़मानत रद्द करते हुए सख्त टिप्पणी की है कि “जिसे रक्षक बनाकर नियुक्त किया गया था, वही राक्षस बन गई।” न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि आरोपी द्वारा किए गए अपराध “न्यायालय की अंतरात्मा को झकझोरने वाले” हैं और समाज पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।
यह आदेश उस अपील पर आया जो एक पीड़िता द्वारा उस ज़मानत आदेश के खिलाफ दायर की गई थी जिसे पटना हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 14(A)(2) के तहत पारित किया था।
पीड़िता का आरोप और मामला दर्ज होने की पृष्ठभूमि:
प्रोसीक्यूशन के अनुसार, आरोपी जब उत्तर रक्षागृह, गायघाट, पटना की अधीक्षक थीं, तब उन्होंने पीड़िता और अन्य महिलाओं को नशीली दवाएं व इंजेक्शन देकर मानसिक और यौन उत्पीड़न किया। आरोप है कि आरोपी इन महिलाओं को संरक्षण गृह से बाहर भेजती थीं ताकि प्रभावशाली लोगों को यौन सेवाएं दी जा सकें।
यह एफआईआर तब दर्ज हुई जब पटना हाईकोर्ट ने एक समाचार पत्र की रिपोर्ट पर स्वत: संज्ञान लिया और जांच की निगरानी शुरू की। विशेष न्यायालय ने भी इस मामले में संज्ञान लिया था।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी:
सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“आरोपी संरक्षण गृह की प्रभारी अधिकारी थी, जिसे महिलाओं की रक्षा करनी थी। परंतु उसने उसी पद का दुरुपयोग कर इन बेबस महिलाओं का यौन उत्पीड़न किया। यह न्याय की घोर विडंबना है।”
“यह मामला इतना गंभीर है कि इससे न्यायालय की अंतरात्मा कांप जाती है। ऐसे मामलों में ज़मानत रद्द करना न्याय के हित में आवश्यक हो जाता है।”
कानूनी आधार:
- अदालत ने कहा कि SC/ST Act की धारा 15A(3) के तहत, पीड़िता को ज़मानत याचिका पर विचार करने से पहले नोटिस दिया जाना अनिवार्य था, जिसकी अनुपालना नहीं हुई।
- अदालत ने यह भी कहा कि Shabeen Ahmad बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) के फैसले के आलोक में यह एक असाधारण मामला है जिसमें ज़मानत देना न्याय का मखौल है।
अंतिम आदेश:
- सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए आरोपी की ज़मानत रद्द कर दी।
- अदालत ने कहा कि वह चार सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करें, अन्यथा उनकी ज़मानत जब्त कर गिरफ्तारी सुनिश्चित की जाए।
- ट्रायल कोर्ट और ज़िला प्रशासन को निर्देशित किया गया है कि वे पीड़ितों को समुचित सुरक्षा और सहायता प्रदान करें।
शीर्षक: Victim ‘X’ बनाम बिहार राज्य एवं अन्य (न्यूट्रल सिटेशन: 2025 INSC 877)
अपील अधिनियम: भारतीय दंड संहिता की धाराएं 341, 323, 328, 376, 120-B/34, अनैतिक देह व्यापार निवारण अधिनियम की धाराएं 3 व 4, और SC/ST Act की धाराएं 3(1)(w), 3(2)(va)
