Preventing from going to court is the most serious criminal contempt: Allahabad High Court
🧾 विधि संवाददाता
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि किसी भी व्यक्ति को न्यायालय जाने से रोकना या डराना, आपराधिक अवमानना का सबसे गंभीर रूप है।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर ने एक जनहित याचिका Public Interest Litigation की सुनवाई के दौरान की, जिसमें उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में सरकारी पेड़ों की कटाई और चोरी के आरोप लगाए गए थे।
⚖️ कोर्ट की सख्त टिप्पणी:
न्यायमूर्ति मुनीर ने कहा:
“देश में कोई भी व्यक्ति किसी को न्यायालय जाने और अपनी विधिक राहत प्राप्त करने से डरा नहीं सकता, रोक नहीं सकता। यह न्यायिक प्रक्रिया में सबसे बड़ी बाधा है, और इसीलिए यह आपराधिक अवमानना का सबसे गंभीर मामला है।”
👨⚖️ याचिकाकर्ता की ओर से आरोप:
- याचिकाकर्ता ने स्वयं उपस्थित होकर बताया कि प्रतिवादी संख्या 9 ने उन्हें यह याचिका वापस लेने के लिए धमकाया और उनके भाई व परिवार के अन्य सदस्यों पर हमला किया।
- आरोप है कि स्थानीय पुलिस से सांठगांठ कर प्रतिवादी ने उल्टे याचिकाकर्ता और शिकायतकर्ता के खिलाफ पहली FIR दर्ज करवा दी, जबकि याचिकाकर्ता की FIR बाद में दर्ज हुई।
- पूरक शपथपत्र में कहा गया है कि प्रतिवादी संख्या 9 पर धारा IPC302, 201, 34 IPC व आर्म्स एक्ट Arms Act की धाराओं में आपराधिक मामले दर्ज हैं।
📌 हाईकोर्ट ने माना स्थिति चिंताजनक:
कोर्ट ने विशेष रूप से पूरक हलफनामे के पैरा 9 और 10 का उल्लेख करते हुए कहा:
“यह अत्यंत चिंताजनक है कि प्रतिवादी संख्या 9 अब भी याचिकाकर्ता के पिता, माता और भाई को पीआईएल वापस लेने की धमकी दे रहा है, जिससे उनके परिवार पर गंभीर संकट मंडरा रहा है।”
📝 कोर्ट का आदेश:
- कोर्ट ने प्रतिवादी संख्या 9 को समन जारी किया।
- मामले को 13 अगस्त 2025 को नवीन रूप से पंजीकृत करने का आदेश दिया।
⚖️ वाद शीर्षक:
Amit Singh Parihar vs. State of U.P. and Others
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