स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन पर सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप: ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ श्रेणी के मतदाताओं के नाम सार्वजनिक करने का निर्देश

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पश्चिम बंगाल में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन पर सुप्रीम कोर्ट ने ईसीआई को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ श्रेणी के मतदाताओं के नाम सार्वजनिक करने और समयबद्ध आपत्तियां सुनने के निर्देश दिए।


नई दिल्ली / कोलकाता

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन पर सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप: ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ श्रेणी के मतदाताओं के नाम सार्वजनिक करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभ्यास को लेकर एक अहम आदेश जारी करते हुए निर्वाचन आयोग (ECI) को निर्देश दिया है कि वह ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ श्रेणी में चिह्नित मतदाताओं के नाम सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करे। अदालत के इस निर्देश का तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने स्वागत किया है, जबकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इसे राजनीतिक जीत मानने से इनकार किया है।

CJI सूर्य कांत की अगुवाई वाली पीठ का आदेश

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन-सदस्यीय पीठ ने SIR प्रक्रिया में कथित प्रक्रियागत अनियमितताओं को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिए।

अदालत ने नोट किया कि निर्वाचन आयोग ने कुछ व्यक्तियों को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ श्रेणी में रखते हुए नोटिस जारी किए हैं। ऐसे में, प्रभावित व्यक्तियों को जानकारी और अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से कोर्ट ने निर्देश दिया कि:

  • ऐसे मतदाताओं के नाम
    ग्राम पंचायत भवन, ब्लॉक कार्यालय और वार्ड कार्यालयों में प्रदर्शित किए जाएं
  • राज्य सरकार, निर्वाचन आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग को
    पर्याप्त मानव संसाधन उपलब्ध कराए
  • दस्तावेज़ों, दावों और आपत्तियों की
    सुनवाई प्रक्रिया का विधिवत पालन किया जाए

10 दिन में दावा-आपत्ति दाखिल करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि जिन व्यक्तियों ने अब तक अपने दावे और आपत्तियां दाखिल नहीं की हैं, वे 10 दिनों के भीतर ऐसा करें। साथ ही, दस्तावेज़ प्रस्तुत करने के लिए अधिकृत अधिकारियों को प्राधिकरण पत्र (Authority Letter) जारी करने को भी कहा गया।

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1.2 करोड़ नामों पर विवाद

गौरतलब है कि ERONET पोर्टल पर पश्चिम बंगाल में 1.2 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ श्रेणी में चिह्नित किए गए थे, जिसके बाद राज्य में SIR प्रक्रिया को लेकर तीखा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया था।

TMC की प्रतिक्रिया: “बीजेपी की हार”

TMC के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी ने इसे भाजपा की हार बताते हुए कहा कि:

“एक करोड़ नाम जिन्हें हटाने की कोशिश की जा रही थी, उन्हें बचा लिया गया है। यह बंगाल के लोगों की जीत है। हमारे मतदान अधिकारों पर खतरा था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने मजबूती से खारिज किया।”

उन्होंने आगे कहा कि अदालत में भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हार मिली है और आगे चुनाव में भी हार मिलेगी।

TMC सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने फैसले को निर्वाचन आयोग द्वारा की जा रही “अत्याचारपूर्ण कार्रवाई” पर “बड़ा तमाचा” बताया, जबकि वरिष्ठ अधिवक्ता और TMC सांसद कल्याण बनर्जी ने कहा कि अदालत पारदर्शिता चाहती है और प्रक्रिया अपारदर्शी रही तो हस्तक्षेप करेगी।

राज्यपाल की प्रतिक्रिया

पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सी. वी. आनंद बोस ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा:

“लोकतंत्र के लिए सुधार आवश्यक हैं। मध्यावधि सुधार एक परिपक्व लोकतंत्र की निशानी हैं।”

BJP का रुख: “यह TMC की जीत नहीं”

BJP नेता राहुल सिन्हा ने कहा कि पार्टी अदालत के हर फैसले का सम्मान करती है और यह आदेश किसी एक दल की जीत नहीं है।

“यह फैसला सभी पर लागू होता है। लोकतंत्र तभी बचेगा जब अदालतों का सम्मान किया जाएगा।”

मैदान में तनाव, अदालत में निर्देश

SIR को लेकर तनाव का माहौल राज्य में देखने को मिला। मुर्शिदाबाद के लालबाग एसडीओ कार्यालय के बाहर फॉर्म-7 जमा करने को लेकर TMC और BJP समर्थकों के बीच झड़प हुई।
BJP ने TMC विधायक आसिफ मजूमदार पर फॉर्म फाड़ने का आरोप लगाया, जिसे उन्होंने सिरे से खारिज कर दिया।

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आगे की समय-सीमा

  • दावे-आपत्तियां दाखिल करने की अंतिम तिथि: 19 जनवरी 2026
  • सुनवाई: 7 फरवरी 2026 तक
  • अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन: 14 फरवरी 2026

Tags: Supreme Court, Election Commission of India, Special Intensive Revision, Electoral Rolls, West Bengal Elections, Logical Discrepancies, TMC vs BJP

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