Supreme Court का फैसला: वर्णांधता के कारण नौकरी से हटाना अनुचित, वैकल्पिक रोजगार देना होगा – संवैधानिक कर्तव्य की पुन: पुष्टि

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Supreme Court’s decision: Dismissal from job due to colour blindness is unfair, alternative employment must be provided – constitutional duty reaffirmed

सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में तेलंगाना राज्य सड़क परिवहन निगम (TSRTC) को फटकार लगाते हुए उस अपीलकर्ता को वैकल्पिक रोजगार देने का निर्देश दिया, जिसे केवल वर्णांधता (कलर ब्लाइंडनेस) के आधार पर समय से पहले सेवानिवृत्त कर दिया गया था।

न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ ने कहा कि निगम ने बिना किसी वास्तविक मूल्यांकन के अपीलकर्ता को सेवा से हटा दिया, जबकि वह गैर-चालक पद पर नियुक्ति चाहता था। यह न केवल 1979 के बाध्यकारी औद्योगिक समझौते की अवहेलना थी, बल्कि प्राकृतिक न्याय और समायोजन के सिद्धांतों का भी उल्लंघन था।


🔎 पृष्ठभूमि:

  • अपीलकर्ता को 2014 में ड्राइवर पद पर नियुक्त किया गया था।
  • चिकित्सा जांच में वर्णांध पाए जाने पर निगम ने उसे 2016 में सेवा से हटा दिया।
  • अपीलकर्ता ने वैकल्पिक रोजगार की माँग की थी, लेकिन निगम ने नियमों का हवाला देकर मना कर दिया।
  • एकल न्यायाधीश पीठ ने अपीलकर्ता के पक्ष में निर्णय दिया, परन्तु खंडपीठ ने उसे रद्द कर दिया।
  • मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा।

⚖️ सर्वोच्च न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ:

  • केवल मेडिकल सर्टिफिकेट के आधार पर सेवा समाप्ति न्यायसंगत नहीं, जब तक यह स्पष्ट न हो कि वैकल्पिक पद उपलब्ध नहीं या सृजित नहीं किया जा सकता
  • 1979 के समझौते की धारा 14 वर्णांध चालकों को वेतन और सेवा निरंतरता के साथ वैकल्पिक रोजगार देने की बाध्यता स्थापित करती है। यह आज भी वैध और लागू है।
  • 1986 का नया समझौता 1979 वाले को न तो स्पष्ट रूप से रद्द करता है और न ही उसकी मान्यता को खत्म करता है। दोनों सामंजस्यपूर्ण रूप से लागू होते हैं।
  • 2014-15 के प्रशासनिक परिपत्र कोई वैधानिक नियम नहीं हैं, और वे औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत हुए वैधानिक समझौते को नकार नहीं सकते।
  • निगम की निष्क्रियता तटस्थता नहीं, बल्कि संस्थागत बहिष्कार का रूप है।
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📌 संवैधानिक सिद्धांतों पर बल:

  • सेवा के दौरान विकलांगता पर करुणा नहीं, संवैधानिक दायित्व आधारित प्रतिक्रिया होनी चाहिए।
  • विकलांगता के कारण सेवा से हटाए गए कर्मचारियों को पुनर्नियुक्ति का अवसर देना मानवाधिकार और सम्मान का प्रश्न है।
  • कुणाल सिंह बनाम भारत संघ (2003) के निर्णय को उद्धृत करते हुए न्यायालय ने कहा:
    जब सेवा के दौरान विकलांगता आती है, तो व्यवस्था को समायोजन करना चाहिए, न कि बहिष्कृत।

🧾 अंतिम आदेश:

  • न्यायालय ने अपील स्वीकार कर ली।
  • TSRTC को निर्देश दिया गया कि वह अपीलकर्ता को 06-01-2016 के समय वेतन ग्रेड और सेवावधि बनाए रखते हुए उपयुक्त वैकल्पिक पद पर नियुक्त करे।

यह निर्णय न केवल दिव्यांग अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि राज्य नियोक्ताओं की जिम्मेदारी केवल नौकरी देने की नहीं, बल्कि मानव गरिमा के संरक्षण की भी है।

🧭 यह फैसला भविष्य में सेवा में दिव्यांगता के मामलों में मार्गदर्शक नज़ीर के रूप में देखा जाएगा।

चौ. जोसेफ बनाम तेलंगाना एसटीआरसी, SLP (C) No. 36278/2017

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