सुप्रीम कोर्ट का फैसला: ओडिशा हाईकोर्ट का आदेश रद्द, कहा—जब मध्यस्थता समझौता मौजूद हो तो कोर्ट को मामले के गुण-दोष में नहीं जाना चाहिए

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सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए कहा कि जब मध्यस्थता समझौता मौजूद हो, तो कोर्ट को दावे की मेरिट पर नहीं जाना चाहिए। हिंदुस्तान प्रीफैब लिमिटेड और एनएलयू ओडिशा विवाद में न्यायमूर्ति भास्कर भट्टाचार्य को एकल मध्यस्थ नियुक्त किया गया।

📰 सुप्रीम कोर्ट का फैसला: ओडिशा हाईकोर्ट का आदेश रद्द, कहा—जब मध्यस्थता समझौता मौजूद हो तो कोर्ट को मामले के गुण-दोष में नहीं जाना चाहिए

नई दिल्ली | विधि संवाददाता: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ओडिशा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें हिंदुस्तान प्रीफैब लिमिटेड (HPL) की याचिका खारिज कर दी गई थी। कंपनी ने नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, ओडिशा (NLUO) के साथ हुए अनुबंध विवाद में मध्यस्थ (Arbitrator) की नियुक्ति की मांग की थी।

न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भूयान की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जब किसी अनुबंध में मध्यस्थता समझौता (Arbitration Agreement) का अस्तित्व विवादित नहीं है, तो न्यायालय को केवल उसी तक सीमित रहना चाहिए और दावे की योग्यता या मेरिट पर विचार नहीं करना चाहिए।


⚖️ मामले की पृष्ठभूमि

हिंदुस्तान प्रीफैब लिमिटेड, जो एक सरकारी उपक्रम है, को एनएलयू ओडिशा ने निर्माण कार्य का ठेका दिया था। कंपनी ने एक ठेकेदार को परियोजना का कार्यान्वयन सौंपा, लेकिन बाद में ठेकेदार और एचपीएल के बीच विवाद उत्पन्न हुआ, जो मध्यस्थता में गया।

मध्यस्थता कार्यवाही एचपीएल के खिलाफ समाप्त हुई और उसके विरुद्ध एक Arbitral Award पारित हुआ। एचपीएल ने इस पुरस्कार को मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 (Section 34) के तहत चुनौती दी, जिस पर फिलहाल स्थगन आदेश लागू है।

एचपीएल ने अपने अनुबंध की धारा 47 का हवाला देते हुए कहा कि अगर किसी ठेकेदार के पक्ष में कोई मध्यस्थता पुरस्कार पारित होता है, तो उसका भुगतान ग्राहक (यहां NLU ओडिशा) द्वारा किया जाएगा। इसी आधार पर एचपीएल ने विश्वविद्यालय से पुनर्भुगतान (Reimbursement) की मांग की।

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एनएलयू ओडिशा ने यह कहते हुए दायित्व से इनकार किया कि जब तक मध्यस्थता पुरस्कार पर स्थगन है और वह अंतिम रूप नहीं लेता, तब तक भुगतान की जिम्मेदारी उत्पन्न नहीं होती।


🏛️ हाईकोर्ट का दृष्टिकोण और सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप

ओडिशा हाईकोर्ट ने एचपीएल की Section 11(6) के तहत दायर याचिका खारिज कर दी थी, यह कहते हुए कि फिलहाल कोई कारण-ए-कार्रवाई (Cause of Action) नहीं है क्योंकि पुरस्कार अंतिम नहीं हुआ है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा —

“मध्यस्थ की नियुक्ति के चरण पर न्यायालय की भूमिका केवल यह सुनिश्चित करने तक सीमित है कि क्या मध्यस्थता समझौता अस्तित्व में है या नहीं। एक बार यह स्थापित हो जाए, तो यह प्रश्न कि दावा टिकाऊ है या नहीं, मध्यस्थ द्वारा तय किया जाएगा।”

कोर्ट ने अपने पूर्ववर्ती निर्णयों का हवाला देते हुए दोहराया कि —

“जब मध्यस्थता समझौता है, तो मामला वहीं समाप्त हो जाता है। न्यायालय को दावे की मेरिट या अधिकारिता पर विचार करने की आवश्यकता नहीं होती।”


⚖️ सुप्रीम कोर्ट का आदेश

खंडपीठ ने कहा कि यह प्रश्न कि NLU ओडिशा की देयता (Liability) पुरस्कार पारित होने के साथ उत्पन्न होती है या भुगतान के बाद, एक Arbitrable Issue है — जिसका निर्णय मध्यस्थ करेगा, न कि न्यायालय।

इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा हाईकोर्ट का 8 सितंबर 2023 का आदेश रद्द करते हुए न्यायमूर्ति भास्कर भट्टाचार्य, पूर्व मुख्य न्यायाधीश, गुजरात हाईकोर्ट, को एकल मध्यस्थ (Sole Arbitrator) नियुक्त किया।

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कोर्ट ने निर्देश दिया कि न्यायमूर्ति भट्टाचार्य आदेश प्राप्त होने के 15 दिनों के भीतर मध्यस्थता और सुलह अधिनियम की धारा 12 तथा छठी अनुसूची (Sixth Schedule) के तहत आवश्यक घोषणा प्रस्तुत करें। उनकी फीस चौथी अनुसूची (Fourth Schedule) के अनुसार तय होगी।


👩‍⚖️ पक्षकारों की पैरवी

एचपीएल की ओर से अधिवक्ता गौरव गुप्ता, राजेश कुमार, विनीत त्यागी और गौरव गोयल (AOR) उपस्थित हुए।
एनएलयू ओडिशा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा, अधिवक्ता पंकज सिंगल, अक्षत कुमार, असीमा गुप्ता, चंदन कश्यप, हर्षिता, मोनू कुमार और सौगत, के साथ आयुष आनंद (AOR) उपस्थित हुए।


⚖️ निष्कर्ष

यह फैसला पुनः पुष्टि करता है कि मध्यस्थता प्रक्रिया में न्यायालय की भूमिका सीमित है और यदि समझौता मौजूद है, तो उसे लागू करने से न्यायालय पीछे नहीं हट सकता।
इस निर्णय से अनुबंध विवादों में Arbitration Clauses की वैधता और प्रवर्तन को लेकर स्पष्टता आई है।


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