कोविड में पति की मृत्यु, बैंक की सख़्ती पर सुप्रीम कोर्ट की संवेदना: अनुच्छेद 142 के तहत विधवा को OTS राहत

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सुप्रीम कोर्ट ने कोविड-19 के दौरान पति की मृत्यु से आर्थिक संकट झेल रही विधवा को अनुच्छेद 142 के तहत बड़ी राहत देते हुए ₹33 लाख में बैंक ऋण निपटान और गिरवी संपत्ति के दस्तावेज़ लौटाने का निर्देश दिया।


कोविड में पति की मृत्यु, बैंक की सख़्ती पर सुप्रीम कोर्ट की संवेदना: अनुच्छेद 142 के तहत विधवा को OTS राहत

सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के अंतर्गत अपनी असाधारण संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए एक विधवा महिला को वन टाइम सेटलमेंट (OTS) का लाभ प्रदान किया, भले ही वह योजना औपचारिक रूप से समाप्त हो चुकी थी। न्यायालय ने मामले को “असामान्य और दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों” से ग्रस्त बताते हुए यह राहत दी।

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने यह आदेश मद्रास हाईकोर्ट के उन फैसलों के विरुद्ध अपील में पारित किया, जिनमें अपीलकर्ता की याचिका खारिज कर दी गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता के पति FILSA Leathers नामक फर्म के स्वामी थे, जिन्होंने प्रतिवादी सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया से ₹50 लाख की क्रेडिट सुविधा ली थी। इसके लिए 3240 वर्ग फुट का आवासीय मकान गिरवी रखा गया था।

दूसरी कोविड लहर के दौरान, 25 मई 2021 को अपीलकर्ता के पति का निधन हो गया। रिकॉर्ड के अनुसार, उनकी मृत्यु तक—

  • ऋण खाते की किस्तें नियमित रूप से चुकाई जा रही थीं
  • खाता NPA नहीं था

पति की मृत्यु के बाद बैंक ने खाते को NPA घोषित कर दिया और SARFAESI Act, 2002 के तहत कार्यवाही शुरू की।

OTS और विवाद

जनवरी 2024 में बैंक ने—

  • कुल बकाया ₹71 लाख के विरुद्ध
  • ₹34,69,000 की OTS पेशकश की
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अपीलकर्ता ने—

  • 10% अग्रिम राशि ₹3,46,900 जमा की
  • लेकिन शेष राशि समय सीमा में नहीं चुका सकीं

बाद में जब उन्होंने उसी OTS का लाभ देने का अनुरोध किया, तो आरोप है कि बैंक ने अतिरिक्त ₹9 लाख की मांग की और फिर धारा 13(4), SARFAESI Act के तहत कब्ज़ा नोटिस जारी कर दिया।

हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक

अपीलकर्ता की रिट याचिका 10.09.2024 और 28.10.2024 को मद्रास हाईकोर्ट द्वारा खारिज कर दी गई, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।

अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि—

  • OTS का लाभ उनसे “बिना किसी दोष के” छीन लिया गया
  • उनकी देनदारी ₹31.22 लाख से अधिक नहीं हो सकती
  • पति की मृत्यु के बाद उनके पास सीमित संसाधन हैं

वहीं बैंक ने कहा कि—

  • उसकी मांग कानूनी रूप से टिकाऊ है
  • OTS की शर्तों का पालन नहीं किया गया

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

पीठ ने माना कि—

“बैंक की मांग विधिक रूप से सही है, लेकिन उसका कठोर प्रवर्तन अपीलकर्ता को अत्यधिक कठिनाई में डाल देगा।”

न्यायालय ने यह भी नोट किया कि—

  • कोविड-19 के दौरान पति की मृत्यु
  • उसके बाद अचानक वित्तीय संकट
  • और खाते का NPA घोषित होना
    इन सबने मामले को असाधारण बना दिया।

अनुच्छेद 142 के तहत राहत

न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति” के लिए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि—

  • अपीलकर्ता ₹33,00,000 जमा करेगी
  • यह राशि पहले से जमा ₹3,46,900 के अतिरिक्त होगी
  • भुगतान 8 सप्ताह के भीतर किया जाएगा
  • भुगतान पर आगे का ब्याज स्थिर (फ्रीज़) रहेगा
  • राशि जमा होने पर बैंक—
    • नो-ड्यूज़ सर्टिफिकेट जारी करेगा
    • मूल टाइटल डीड्स वापस करेगा
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डिफॉल्ट की स्थिति में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि—

“कानून अपना रास्ता खुद तय करेगा।”

नज़ीर नहीं होगा यह आदेश

अंत में न्यायालय ने साफ किया कि—

यह आदेश इस मामले की विशिष्ट परिस्थितियों तक सीमित है और इसे बैंक के विरुद्ध नज़ीर के रूप में उद्धृत नहीं किया जाएगा


मामला संदर्भ

Sumaiya Parveen v. Central Bank of India
Civil Appeal arising out of SLP (C) Nos. 29289–29290 of 2024
निर्णय दिनांक: 16 जनवरी 2026


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