मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत महिलाओं के अधिकारों के कथित उल्लंघन से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि इस तरह के विवादों का स्थायी समाधान यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मामले की सुनवाई में कहा कि समाधान यूनिफॉर्म सिविल कोड हो सकता है। कोर्ट ने संसद को इस विषय पर कानून बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
Supreme Court of India ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत महिलाओं के अधिकारों के कथित उल्लंघन से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि इस तरह के विवादों का स्थायी समाधान यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) हो सकता है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि इस विषय पर संसद को कानून बनाने पर विचार करना चाहिए।
यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश Chief Justice of India Surya Kant, जस्टिस Joymalya Bagchi और जस्टिस R. Mahadevan की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने की।
‘समाधान यूनिफॉर्म सिविल कोड’
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि अदालत के लिए पर्सनल लॉ को पूरी तरह अमान्य घोषित कर देना उचित नहीं होगा, क्योंकि इससे कानूनी शून्य (Legislative Vacuum) पैदा हो सकता है।
उन्होंने कहा कि ऐसे जटिल मुद्दों पर फैसला लेना विधायिका का काम है, ताकि संसद इस विषय पर व्यापक कानून बना सके।
जस्टिस बागची ने कहा:
“पर्सनल लॉ को अमान्य घोषित कर वैक्यूम पैदा करने के बजाय बेहतर होगा कि इसे विधायिका की समझ पर छोड़ा जाए, ताकि वह यूनिफॉर्म सिविल कोड पर कानून ला सके।”
इस पर सहमति जताते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि इस समस्या का उत्तर यूनिफॉर्म सिविल कोड हो सकता है।
1937 के कानून को चुनौती
याचिकाकर्ताओं ने Muslim Personal Law (Shariat) Application Act, 1937 को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि इस कानून के कुछ प्रावधान मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव करते हैं, विशेषकर उत्तराधिकार (inheritance) के मामलों में।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता Prashant Bhushan ने कहा कि शरिया कानून के तहत महिलाओं को विरासत में पुरुषों की तुलना में आधा हिस्सा मिलता है, जो समानता के संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ है।
कोर्ट की चिंता: कानूनी शून्य
पीठ ने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि यदि 1937 का कानून रद्द कर दिया जाता है तो उसकी जगह कौन सा कानून लागू होगा।
CJI ने पूछा:
“यदि आप 1937 एक्ट को चुनौती दे रहे हैं, तो उसके हटने के बाद क्या लागू होगा? उस वैक्यूम का क्या होगा?”
प्रशांत भूषण ने जवाब दिया कि ऐसी स्थिति में Indian Succession Act, 1925 लागू किया जा सकता है, जो विरासत के मामलों में पुरुषों और महिलाओं को समान अधिकार देता है।
हालांकि, जस्टिस बागची ने इस तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर 1937 का कानून नहीं रहेगा, तो क्या उत्तराधिकार के मामले संविधान के अनुच्छेद 372 के तहत जारी पर्सनल लॉ के आधार पर नहीं चलेंगे।
जल्दबाजी में न्यायिक हस्तक्षेप से बचने की सलाह
CJI सूर्यकांत ने यह भी संकेत दिया कि अदालत को इस मुद्दे पर जल्दबाजी में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे महिलाओं के मौजूदा अधिकारों पर भी असर पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि सुधार की जल्दबाजी में ऐसा न हो कि महिलाओं को पहले से मिले अधिकार भी कम हो जाएं।
याचिका में संशोधन का सुझाव
अदालत ने याचिकाकर्ताओं को सुझाव दिया कि वे अपनी याचिका में संशोधन कर मुद्दे को अधिक स्पष्ट और प्रभावी तरीके से पेश करें।
CJI ने कहा कि अदालत का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि देश की महिलाओं का कोई वर्ग अपने अधिकारों से वंचित है, तो उन्हें उनके अधिकार वापस मिलें।
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