सुप्रीम कोर्ट ने 2:1 बहुमत से अपने Vanashakti (2025) फैसले को वापस लेते हुए एक्स-पोस्ट फैक्टो पर्यावरण मंजूरियों पर बड़ा निर्णय दिया। CJI गवई और जस्टिस चंद्रन ने कहा कि पूर्ण परियोजनाओं को तोड़ना सार्वजनिक हित के खिलाफ है, जबकि जस्टिस भुइयाँ ने इसे पर्यावरण न्यायशास्त्र के लिए पीछे हटना बताया।
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा U-Turn: एक्स-पोस्ट फैक्टो पर्यावरण मंजूरी पर 2:1 बहुमत से Vanashakti फैसला वापस
⚖️ सुप्रीम कोर्ट ने 2:1 बहुमत से बदला अपना ही फैसला — “एक्स-पोस्ट फैक्टो पर्यावरण मंजूरी” पर बड़ा U-Turn
— CREDAI की पुनर्विचार याचिका स्वीकार, Vanashakti निर्णय (2025) को किया रद्द
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पर्यावरण कानून के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक मोड़ लेते हुए 2:1 के बहुमत से अपने 16 मई 2025 के Vanashakti फैसले को वापस ले लिया है—वह फैसला जिसमें 2017 की अधिसूचना और 2021 के ऑफिस मेमोरेंडम के तहत दी गई एक्स-पोस्ट फैक्टो पर्यावरण मंजूरी (Environmental Clearance—EC) को पूरी तरह अवैध घोषित किया गया था।
नवीन निर्णय CREDAI की पुनर्विचार याचिका पर आया है और इसका असर देश की 20,000 करोड़ रुपए से अधिक की सार्वजनिक परियोजनाओं पर पड़ेगा।
निर्णय सीजेआई CJI, जस्टिस विनोद चंद्रन (बहुमत) और जस्टिस उज्जल भुइयाँ (विरोध) की बेंच ने सुनाया।
⚖️ CJI गवई: “पहले से बने प्रोजेक्ट्स को गिराना सार्वजनिक संसाधनों की बर्बादी”
CJI गवई ने सरकार और सार्वजनिक निकायों की परियोजनाओं पर निर्णय के प्रभाव को रेखांकित करते हुए कहा—
“पूर्ण परियोजनाओं को केवल इसलिए गिराना कि मंजूरी बाद में मिली, सार्वजनिक हित के विपरीत है। यह तो सार्वजनिक धन को कूड़ेदान में फेंकने जैसा होगा।”
उन्होंने साफ कहा कि:
- EP Act की धारा 15 केवल दंड से संबंधित है, यह न तो नियमितीकरण को रोकती है और न अनुमति देती है।
- 2017 और 2021 की अधिसूचनाओं के तहत केवल उन्हीं परियोजनाओं को एक्स-पोस्ट मंजूरी मिल सकती है जो कानूनन अनुमति योग्य हैं।
CJI ने चेतावनी दी कि यदि पूर्व निर्णय जारी रहा तो:
✔️ सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट
✔️ पब्लिक हाउसिंग
✔️ इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स
✔️ सरकारी भवन
जैसी परियोजनाओं को ध्वस्त करना पड़ेगा, जिससे पर्यावरण को और अधिक हानि होगी—
“पहले तोड़ो, फिर मंजूरी लेकर दोबारा बनाओ — यह तर्क पर्यावरण की रक्षा नहीं, बल्कि प्रदूषण को बढ़ावा देगा।”
⚖️ जस्टिस विनोद चंद्रन (सहमति): “संतुलित दृष्टिकोण नजरअंदाज हुआ था”
जस्टिस चंद्रन ने सहमति जताते हुए कहा कि मूल निर्णय ने:
- Common Cause,
- Alembic,
- Electrosteel,
- D. Swamy
जैसे मामलों के मूल सिद्धांतों पर ध्यान नहीं दिया।
उन्होंने कहा—
“संतुलन के सिद्धांतों की उपेक्षा हुई थी। इसलिए पुनर्विचार न केवल उचित बल्कि आवश्यक है।”
❗ जस्टिस उज्जल भुइयाँ का कड़ा असहमति—“यह पर्यावरण न्यायशास्त्र के लिए धक्का”
जस्टिस भुइयाँ ने बहुमत से तीखा मतभेद जताया—
“रीव्यू निर्णय पूर्व-सावधानी सिद्धांत (Precautionary Principle) की मूल भावना को नजरअंदाज करता है। ‘पॉल्युटर पे’ सिद्धांत पुनर्स्थापन का सिद्धांत है, उसका उपयोग गलत तरीके से किया जा रहा है।”
उन्होंने चेताया:
- यह फैसला पर्यावरण कानून में प्रतिगमन (retrogression) है
- परियोजना निर्माण पहले और मंजूरी बाद में — यह न्यायशास्त्र के लिए खतरनाक संदेश है
🧑⚖️ कानूनी पृष्ठभूमि — विवाद कैसे शुरू हुआ?
- EIA Notification 2006 के तहत सभी बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए पहले पर्यावरण मंजूरी अनिवार्य है।
- 2017 की अधिसूचना ने ‘एक्स-पोस्ट फैक्टो’ मंजूरी को अनुमति दी—यानी बिना पूर्व EC के शुरू प्रोजेक्ट्स को बाद में अनुमति।
- Vanashakti (2025) फैसले ने इसे अवैध ठहराया था।
- CREDAI, कई राज्य सरकारें, और सार्वजनिक निकाय इस फैसले से गंभीर रूप से प्रभावित हुए।
🔍 बहुमत का निष्कर्ष
- एक्स-पोस्ट फैक्टो EC पूर्ण प्रतिबंधित नहीं, बल्कि कड़े मूल्यांकन के बाद दी जा सकती है।
- सार्वजनिक हित—विशेषतः सरकारी परियोजनाओं—का संरक्षण महत्वपूर्ण।
- पूर्व निर्णय per incuriam था क्योंकि समान स्तर की बेंच के फैसलों की अवहेलना की गई।
🏛️ परिणाम — अब आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट ने:
- Vanashakti Judgment (2025) को वापस लिया,
- मामला मुख्य न्यायाधीश को प्रशासनिक आदेश हेतु भेजा,
- सभी प्रभावित परियोजनाओं को तत्काल राहत दी।
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