’11 साल बाद सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: रेप convict की रिहाई याचिका खारिज, न्यूनतम सज़ा बहाल’

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सुप्रीम कोर्ट ने 11 साल से आज़ाद घूम रहे दुष्कर्मी की सभी दलीलें—उम्र, शादी, सहमति और स्मेग्मा—खारिज करते हुए उसकी सजा बहाल कर दी। 1993 के नाबालिग दुष्कर्म मामले में अदालत ने न्यूनतम वैधानिक सजा दोहराई और आरोपी को आत्मसमर्पण का आदेश दिया। जानें पूरी कानूनी पड़ताल।

’11 साल बाद सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: रेप convict की रिहाई याचिका खारिज, न्यूनतम सज़ा बहाल


✍️ 600-शब्दों में लीगल जर्नलिस्ट शैली में रिपोर्ट (Hindi)

नाबालिग से दुष्कर्म के 30 साल पुराने मामले में न्याय आखिरकार अपनी मंज़िल तक पहुँच गया। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उस दुष्कर्मी की सभी दलीलें खारिज कर दीं, जो 11 वर्षों से सज़ा निलंबित होने के कारण खुलेआम घूम रहा था। आरोपी ने उम्र, शादी, सहमति और फॉरेंसिक रिपोर्ट की तकनीकी दलीलों का सहारा लेते हुए सज़ा कम करने की गुहार लगाई, लेकिन अदालत ने दो-टूक कहा कि ऐसे अपराधों में राहत का कोई कानूनी आधार नहीं है। अदालत ने न केवल उसकी सजा बहाल की, बल्कि चार सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का आदेश भी दिया।

मामले की पृष्ठभूमि—1993 की दरिंदगी और तीन दशक लंबी न्याय यात्रा

यह मामला 1993 का है जब पंजाब में एक नाबालिग बच्ची से दुष्कर्म किया गया था। ट्रायल कोर्ट ने 1994 में आरोपी को सजा सुनाई, जिसे हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा। लेकिन 2013 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा और 2014 में आरोपी को राहत मिलते हुए उसकी सजा निलंबित कर दी गई। वह तब से लेकर अब तक—करीब 11 साल—आज़ाद था।

अब, जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कुलदीप सिंह बनाम पंजाब राज्य में आरोपी की अपील को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन न्याय मिलता ज़रूर है।

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शादी और उम्र के आधार पर राहत की माँग—अदालत ने सख्ती से किया इंकार

करीब 50 वर्ष के हो चुके आरोपी ने अदालत से अपील की थी कि चूंकि उसकी शादी हो चुकी है और वह उम्रदराज़ हो गया है, इसलिए उसकी सजा “जेल में काटी गई अवधि” तक सीमित कर दी जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को तुरंत खारिज करते हुए कहा:

“घटना के समय IPC 376 के तहत न्यूनतम सजा 7 वर्ष थी। अदालत इस न्यूनतम सजा से नीचे नहीं जा सकती।”

यह टिप्पणी स्पष्ट करती है कि नाबालिग से दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराधों में व्यक्तिगत परिस्थितियाँ राहत का आधार नहीं बन सकतीं।

‘स्मेग्मा’ वाली दलील पर कड़ी टिप्पणी—वैज्ञानिक आधार पर किया खारिज

मामले में आरोपी ने एक और असाधारण दलील दी—कि उसके प्राइवेट पार्ट पर पाए गए स्मेग्मा से यह साबित होता है कि उसने यौन संबंध नहीं बनाए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल ज्यूरिसप्रूडेंस का हवाला देते हुए इसे पूरी तरह अवैज्ञानिक और असंगत बताया।

अदालत ने कहा:

  • स्मेग्मा 24 घंटे न स्नान करने पर भी बन सकता है।
  • उसकी मौजूदगी या अनुपस्थिति से यह सिद्ध नहीं होता कि यौन संबंध हुआ या नहीं।
  • और महिला के निजी अंग में मात्र प्रवेश भी भारतीय कानून में बलात्कार की परिभाषा में आता है।

इस प्रकार स्मेग्मा को निर्दोषता का “वैज्ञानिक प्रमाण” बताने की कोशिश अदालत ने सिरे से नकार दी।

उम्र पर विवाद—स्कूल प्रमाण पत्र नहीं, जन्म प्रमाण पत्र का होगा महत्व

आरोपी ने यह भी दलील दी कि पीड़िता के स्कूल प्रमाण पत्र के अनुसार वह 16 वर्ष से अधिक थी, इसलिए मामला “सहमति” का हो सकता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा:

  • जन्म प्रमाण पत्र, जिसे कानूनी प्राधिकार जारी करता है,
  • स्कूल एडमिशन रिकॉर्ड से अधिक विश्वसनीय और प्रमाणिक होता है।
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जन्म प्रमाण पत्र के अनुसार पीड़िता नाबालिग थी, इसलिए सहमति का तर्क कानूनी रूप से पूरी तरह निष्प्रभावी हो गया।

11 वर्षों की रिहाई का अंत—फिर जेल भेजा जाएगा दुष्कर्मी

अदालत ने सजा बहाल करते हुए कहा कि दोषी को 4 सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करना होगा। यह फैसला न केवल पीड़िता के लिए न्याय का दरवाज़ा फिर खोलता है बल्कि एक स्पष्ट संदेश भी देता है—गंभीर लैंगिक अपराधों में तकनीकी दलीलें न्याय को भटका नहीं सकतीं।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बताता है कि:

  • नाबालिग से दुष्कर्म जैसे अपराधों में न्यूनतम सजा से नीचे जाने का कोई विकल्प नहीं,
  • वैज्ञानिक तथ्यों का गलत इस्तेमाल अदालत में नहीं चल सकता,
  • जन्म प्रमाण पत्र जैसी आधिकारिक दस्तावेज़ी उम्र को ही अदालत मान्यता देगी।

तीन दशक बाद आया यह निर्णय साबित करता है कि न्याय देर से मिले, लेकिन मिलता अवश्य है।


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