‘डिग्री के नाम पर नहीं, पढ़ाए गए विषय पर होगी योग्यता तय: सुप्रीम कोर्ट’

सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि यदि अभ्यर्थी ने अपने स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में सांख्यिकी को प्रमुख विषय के रूप में पढ़ा है, तो केवल डिग्री के नाम में “Statistics” न होने से उसे अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने एमपी सरकार द्वारा लक्ष्मीकांत शर्मा की सेवा-समाप्ति को मनमाना बताते हुए रद्द किया और पुनः नियुक्ति का आदेश दिया।

डिग्री के नाम पर नहीं, पढ़ाए गए विषय पर होगी योग्यता तय: सुप्रीम कोर्ट


सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: ‘डिग्री टाइटल’ नहीं, पाठ्यक्रम की वास्तविक पढ़ाई तय करेगी योग्यता; लक्ष्मीकांत शर्मा की बर्खास्तगी रद्द, सेवा बहाल करने का आदेश

एक अहम निर्णय देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी अभ्यर्थी की नियुक्ति को केवल इस आधार पर अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि उसकी डिग्री के शीर्षक (degree nomenclature) में अनिवार्य विषय का नाम दर्ज नहीं है। यदि अभ्यर्थी ने अपने स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में उस विषय को प्रमुख घटक (principal component) के रूप में अध्ययन किया है, तो उसे अयोग्य घोषित करना “substance over form” सिद्धांत के विपरीत है।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह फैसला देते हुए लक्ष्मीकांत शर्मा की अपील को स्वीकार कर मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने राज्य सरकार द्वारा उनकी संविदा सेवा समाप्त करने को सही ठहराया था।


विवाद की पृष्ठभूमि

लोक स्वास्थ्य एवं अभियांत्रिकी विभाग, जल मिशन (छत्तीसगढ़) ने मॉनिटरिंग एंड इवैल्यूएशन कंसल्टेंट के पद हेतु विज्ञापन जारी किया था, जिसमें न्यूनतम योग्यता—
“सरकारी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से सांख्यिकी (Statistics) में स्नातकोत्तर डिग्री, न्यूनतम 60% अंकों के साथ”
निर्धारित की गई थी।

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अपीलकर्ता शर्मा के पास M.Com (Commerce) की डिग्री थी, जिसके पाठ्यक्रम में Business Statistics और Indian Economic Statistics मुख्य विषयों (principal subjects) के रूप में शामिल थे। दस्तावेज़ों के सत्यापन के बाद उन्हें 2013 में संविदा पर नियुक्त किया गया, परंतु कुछ महीनों बाद एक आठ-सदस्यीय समिति ने उन्हें अयोग्य बताते हुए रिपोर्ट दे दी, जिसके आधार पर उनकी सेवा समाप्त कर दी गई।


उच्च न्यायालय में लगातार विवाद, लेकिन राज्य का रुख वही

उच्च न्यायालय ने कई अवसरों पर सेवा-समाप्ति आदेशों को रद्द कर विभाग को पुनर्विचार करने का निर्देश दिया। पुनर्विचार के दौरान दो महत्वपूर्ण दस्तावेज सामने आए—

  1. 30 मार्च 2019 का विश्वविद्यालय प्रमाणपत्र, जिसमें स्पष्ट कहा गया कि M.Com में Business Statistics प्रमुख विषय था।
  2. 23 नवम्बर 2019 का निदेशक का विशेषज्ञ मत, जिसमें अपीलकर्ता की पात्रता स्पष्ट रूप से स्वीकार की गई थी।

इसके बावजूद राज्य ने 2018 और 2020 में पुनः उनकी सेवाएँ समाप्त कर दीं। एकल व खंडपीठ—दोनों ने यह कहते हुए अयोग्यता बरकरार रखी कि उनके पास “Statistics में डिग्री” नहीं है।


सुप्रीम कोर्ट की विश्लेषणात्मक टिप्पणी

शीर्ष अदालत ने सबसे पहले यह महत्वपूर्ण तथ्य दर्ज किया कि—
मध्यप्रदेश के किसी भी सरकारी विश्वविद्यालय में “M.Com (Statistics)” या “Statistics” नाम से कोई भी स्वतंत्र स्नातकोत्तर डिग्री अस्तित्व में ही नहीं है।

ऐसे में केवल डिग्री के नाम पर जोर देना वास्तविकता से परे, अव्यावहारिक और मनमाना है। अदालत ने कहा कि योग्यता का आकलन संदर्भानुकूल (contextual) और उद्देश्यपरक (purposive) होना चाहिए।

समिति की रिपोर्ट में दो गंभीर त्रुटियाँ

  1. सत्य के विपरीत निष्कर्ष: बाद में प्राप्त विश्वविद्यालय प्रमाणपत्र से सिद्ध है कि अपीलकर्ता ने Statistics को प्रमुख विषय के रूप में पढ़ा था।
  2. प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन: समिति ने उन्हें सुने बिना प्रतिकूल रिपोर्ट दी।
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इस दोषपूर्ण रिपोर्ट पर बार-बार निर्भर रहना अदालत के अनुसार “मनमाना” और “अप्रासंगिक सामग्री पर आधारित” था।


निदेशक की विशेषज्ञ राय की अनदेखी अनुचित—सुप्रीम कोर्ट

निदेशक ने अपीलकर्ता के अंकपत्र एवं पाठ्यक्रम का सूक्ष्म परीक्षण कर यह पाया था कि उनके अध्ययन में—

  • Quantitative Methods
  • Business Statistics
  • Economic Statistics
    जैसे विषय प्रमुख थे और वे बिना किसी प्रतिकूल टिप्पणी के लगभग एक वर्ष तक सेवा भी दे चुके थे।

राज्य सरकार ने इस विशेषज्ञ मत को ठुकराने का कोई तर्कसंगत कारण नहीं बताया।


अन्य समान रूप से योग्य अभ्यर्थियों को नियुक्ति—भेदभाव सिद्ध

अदालत ने कहा कि इसी प्रकार के विषय पढ़ने वाले अन्य अभ्यर्थी सेवाओं में बने रहे। अपीलकर्ता को ही अलग रखना Article 14 का सीधा उल्लंघन है।


समाप्ति आदेश रद्द, चार सप्ताह में सेवा बहाल

अदालत ने कहा कि एक संविदा कर्मचारी को भी Article 14 के मानकों पर संरक्षण प्राप्त है। योग्यता की जाँच यदि तथ्यात्मक रूप से गलत आधार पर की गई हो, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।

निर्णय:

  • उच्च न्यायालय का आदेश रद्द।
  • राज्य द्वारा जारी सेवा-समाप्ति आदेश अवैध।
  • अपीलकर्ता को चार सप्ताह के भीतर सेवा में पुनर्स्थापित किया जाए।
  • सभी परिणामस्वरूप लाभ प्रदान किए जाएँ।

साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला विशेष परिस्थितियों पर आधारित है और सामान्य मिसाल (precedent) नहीं माना जाएगा।


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