सुप्रीम कोर्ट ने सरोगेसी कानून लागू होने से पहले फ्रीज़ किए भ्रूण मामलों में अंतरिम आदेश सुरक्षित

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Supreme Court reserves interim order in cases of embryos frozen before surrogacy law came into force

सुप्रीम कोर्ट: सरोगेसी कानून लागू होने से पहले फ्रीज़ किए भ्रूण वाले दंपतियों की याचिकाओं पर अंतरिम आदेश सुरक्षित

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उन याचिकाओं पर अंतरिम आदेश सुरक्षित रख लिया, जिनमें यह सवाल उठाया गया था कि क्या वे दंपति, जिन्होंने Surrogacy (Regulation) Act, 2021 लागू होने से पहले अपने भ्रूण फ्रीज़ करवा दिए थे, अब भी कुछ शर्तों के अधीन सरोगेसी प्रक्रिया को जारी रख सकते हैं।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि वह उन तीन मामलों में आदेश सुरक्षित रख रही है, जिनमें याचिकाकर्ताओं ने कानून के प्रभाव में आने से पहले प्रक्रिया शुरू की थी, परंतु अब उनकी आयु कानून में निर्धारित सीमा से अधिक हो चुकी है।

केंद्र सरकार की दलीलें

सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को बताया कि भारत में महिलाओं के लिए औसतन रजोनिवृत्ति (menopause) की आयु 46.2 वर्ष है। उन्होंने कहा, “ईश्वर की समयसीमा और भी सख्त है।” यह दलील न्यायालय के इस प्रश्न पर दी गई थी कि जब प्राकृतिक गर्भधारण पर कोई आयु सीमा नहीं है तो कृत्रिम विधियों पर क्यों?

ASG ने कहा कि उम्र की सीमा का आधार यौन कोशिकाओं (gametes) की आनुवंशिक गुणवत्ता है। साथ ही यह भी कहा कि यदि कोर्ट अनुच्छेद 142 Article 142 के तहत व्यक्तिगत मामलों में विशेष आदेश देती है, तो केंद्र उसका विरोध नहीं करेगा।

‘क्रिस्टलाइज़ेशन ऑफ राइट’ कब होता है?

ASG ने तर्क दिया कि सरोगेसी प्रक्रिया की शुरुआत भ्रूण को गर्भाशय में प्रत्यारोपित (implantation) करने के साथ होती है, केवल भ्रूण को फ्रीज़ करवा लेना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि अधिकारों की पूर्णता (crystallization of rights) तभी होती है जब भ्रूण गर्भ में प्रत्यारोपित किया जाए।

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न्यायालय की टिप्पणियां

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, “जोखिम तो रहता ही है… क्या कोई गारंटी दे सकता है कि बच्चा पूरी तरह स्वस्थ होगा?… इरादा रखने वाले दंपति खुद जोखिम लेंगे।” जवाब में ASG ने कहा कि ऐसे मामले ‘high risk’ की श्रेणी में आते हैं।

याचिकाकर्ताओं की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पिंकी आनंद ने पहले सुनवाई में कहा था कि याचिकाकर्ताओं ने 25 जनवरी 2022 को कानून लागू होने से पहले भ्रूण को फ्रीज़ करवा लिया था, और वे Surrogacy Rules, 2022 के नियम 14 के अनुसार अन्य सभी शर्तें पूरी करते हैं।

हालांकि, केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि प्रक्रिया की शुरुआत भ्रूण के फ्रीज़ होने से नहीं बल्कि उसके गर्भ में प्रत्यारोपण से होती है। उन्होंने Surrogacy Act की धारा 53 का हवाला दिया, जो संक्रमणकालीन प्रावधान है।

सुप्रीम कोर्ट का रुख

कोर्ट ने कहा था कि वह केवल उन्हीं दंपतियों को अनुमति देने पर विचार कर सकती है, जिन्होंने प्रक्रिया कानून लागू होने से पहले शुरू की थी, और अब केवल उम्र की सीमा पार कर चुके हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि मामला “jurisprudentially in terms of vested rights” के आधार पर तय किया जाना चाहिए।

केंद्र सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि कानून लागू होने से पहले कोई वैध अधिकार नहीं था, और इस तरह की छूट से “floodgates” खुल सकते हैं क्योंकि कई याचिकाएं हाई कोर्टों में लंबित हैं।

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पृष्ठभूमि

यह मामला डॉ. अरुण मुथुवेल द्वारा दायर जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें ART Act, 2021, ART Rules, और Surrogacy Act, 2021 की संवैधानिक वैधता और अंतर्विरोध को चुनौती दी गई है। याचिका में यह भी कहा गया है कि ये प्रावधान गोपनीयता और प्रजनन स्वायत्तता जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।

इससे पहले, जनवरी 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने इन कानूनों की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई स्वीकार की थी, परंतु तत्काल अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया था।

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