🧾 सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा पुलिस STF द्वारा गिरफ्तार वकील विक्रम सिंह को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा, “वकील का पेशेवर संबंध अपराध का आधार नहीं हो सकता।” जानिए पूरे मामले की कानूनी पृष्ठभूमि, याचिका के तर्क और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ।
📰“सुप्रीम कोर्ट ने वकील विक्रम सिंह की गिरफ्तारी पर लगाई रोक, कहा—केवल पेशेवर संबंध को अपराध न माना जाए” | SC Orders Release of Advocate Vikram Singh
सुप्रीम कोर्ट ने कहा — ‘वकील भी कानून के दायरे में पेशेवर कार्य करते हैं, उन्हें अपराध से न जोड़ा जाए’
सुप्रीम कोर्ट ने वकील विक्रम सिंह की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए कहा कि केवल पेशेवर संबंध के आधार पर किसी अधिवक्ता को अपराध से जोड़ना न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। अदालत ने हरियाणा पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF), गुरुग्राम द्वारा की गई गिरफ्तारी को अनुचित ठहराते हुए तत्काल रिहाई का आदेश दिया।
मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अनुपस्थिति में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि याची वकील हैं और “न्याय से भागने की संभावना नहीं है”। कोर्ट ने उन्हें ₹10,000 के बेल बॉन्ड पर अंतरिम जमानत दी और तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया।
“मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए, हम याची को अंतरिम संरक्षण देने के पक्ष में हैं। याची एक अधिवक्ता हैं, इसलिए उनके फरार होने की संभावना नहीं है,” — सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी।
🔹 गिरफ्तारी का विवादित आधार
विक्रम सिंह की गिरफ्तारी हरियाणा पुलिस की STF ने की थी। आरोप था कि वे अपने कुछ आपराधिक मामलों के अभियुक्त क्लाइंट्स की गैरकानूनी गतिविधियों में संलिप्त हैं। गिरफ्तारी सिर्फ अभियुक्तों के बयान (disclosure statements) पर आधारित थी।
विक्रम सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि उनके खिलाफ पूरा मामला केवल एक अभियुक्त नितिन नरूला उर्फ अप्पू के बयान पर टिका है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि वे नरूला की पत्नी का वकील रहे थे — और इसी पेशेवर संबंध के कारण हरियाणा पुलिस ने उन पर संदेह किया।
याचिका में कहा गया —
“याची (विक्रम सिंह) के खिलाफ संदेह केवल उनके पेशेवर संबंध से उत्पन्न हुआ है। यह केवल वकालतन संबंध है, जिसका आपराधिक मामलों से कोई लेना-देना नहीं।”
🔹 “वकील पर दबाव डालना अनुचित”: याचिका में आरोप
अधिवक्ता विक्रम सिंह ने यह भी आरोप लगाया कि हरियाणा पुलिस के कुछ अधिकारियों ने उन्हें अपने ही क्लाइंट्स के खिलाफ बयान देने के लिए दबाव डाला।
उन्होंने तर्क दिया कि यह कार्रवाई Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 (भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023) की धारा 132 का उल्लंघन है, जो यह स्पष्ट करती है कि वकील और उसके क्लाइंट के बीच गोपनीय संचार (professional communication) को जबरन उजागर नहीं कराया जा सकता।
“धारा 132 के तहत वकील को अपने क्लाइंट की गोपनीय बात बताने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। पुलिस द्वारा ऐसा दबाव डालना न केवल अवैध बल्कि पेशे की गरिमा के खिलाफ है।” — याची का तर्क।
🔹 सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी और कानूनी संकेत
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि पुलिस एजेंसियों को वकीलों की पेशेवर भूमिका और अपराध में वास्तविक संलिप्तता के बीच स्पष्ट रेखा खींचनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि “पेशेवर कार्य को अपराध का आधार बनाना न्याय प्रणाली के लिए खतरनाक उदाहरण” होगा।
इस आदेश के बाद अधिवक्ता वर्ग ने राहत की सांस ली, क्योंकि हाल के वर्षों में वकीलों की गिरफ्तारी या पूछताछ के मामलों पर चिंता बढ़ी है, जहाँ उनका अपराध केवल पेशेवर दायित्व निभाना था।
🔹 कानूनी प्रतिनिधित्व
इस मामले में याची की ओर से सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने पैरवी की, उनके साथ अधिवक्ता नवनीत पंवार, भानु प्रताप सिंह, केशव सिंह और मोहम्मद इमरान अहमद उपस्थित रहे।
⚖️ निष्कर्ष
यह फैसला न्यायिक प्रणाली में वकीलों की स्वतंत्रता और पेशेवर गोपनीयता की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि —
“वकील की जिम्मेदारी अपने क्लाइंट का बचाव करना है, न कि उसके अपराध को साझा करना।”
इस आदेश से पुलिस एजेंसियों की जांच प्रक्रिया और अधिवक्ताओं के अधिकारों के बीच एक संतुलन बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है।
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