“क्या एक वकील से ऐसी भाषा की अपेक्षा है?” – सीजेआई
सुप्रीम कोर्ट ने केरल में कांग्रेस विधायक राहुल ममकुट्टाथिल से जुड़े रेप मामले पर फेसबुक पोस्ट लिखने वाली वकील दीपा जोसेफ को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने भाषा को ‘महिलाओं के लिए अपमानजनक’ बताते हुए याचिका खारिज कर हाईकोर्ट जाने की छूट दी।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक महिला वकील द्वारा फेसबुक पर की गई टिप्पणी को लेकर कड़ी नाराजगी जताई। मामला केरल में कांग्रेस विधायक राहुल ममकुट्टाथिल के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म मामलों में से एक से जुड़ा है, जिसमें शिकायतकर्ता महिला के खिलाफ सोशल मीडिया पर पोस्ट किया गया था।
सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ वकील दीपा जोसेफ की ओर से दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में उन्होंने अपनी फेसबुक पोस्ट के संबंध में केरल पुलिस द्वारा संभावित गिरफ्तारी की आशंका जताई थी।
“क्या एक वकील से ऐसी भाषा की अपेक्षा है?” – सीजेआई
सुनवाई की शुरुआत में ही पीठ ने पोस्ट की भाषा और लहजे पर कड़ी आपत्ति जताई।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा,
“क्या आपसे इस तरह की भाषा लिखने की उम्मीद की जाती है? आप एक वकील हैं।”
दीपा जोसेफ ने जवाब दिया कि उन्होंने जो लिखा, वह शिकायतकर्ता महिला के पति द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित था। उनका कहना था कि उन्होंने कोई मानहानिकारक बात नहीं लिखी और न ही पीड़िता की पहचान उजागर की।
हालांकि, पीठ इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हुई। जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि पोस्ट में प्रयुक्त भाषा “महिलाओं के लिए अत्यंत अपमानजनक” है।
सीजेआई ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा,
“हमें आश्चर्य है कि एक महिला दूसरी महिला के खिलाफ इस तरह लिख सकती है। आपने अपनी डिक्शनरी का एक भी शब्द नहीं छोड़ा और फिर भी आपको पछतावा नहीं है!”
गोपनीय जानकारी सार्वजनिक करने पर सवाल
पीठ ने यह भी पूछा कि यदि किसी ने एक वकील के नाते निजी या गोपनीय जानकारी साझा की, तो क्या उसे सार्वजनिक करना उचित है?
सीजेआई ने कहा,
“यदि पति ने आपके पास आकर गोपनीय जानकारी साझा की है, तो क्या आप उसे सार्वजनिक कर देंगी?”
जब मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि क्या पति ने उन्हें “यह सब बकवास लिखने” के लिए कहा था, तो याचिकाकर्ता ने कहा, “यह बकवास नहीं है, महोदय।”
“अधिकारों के लिए मुकदमा या प्रचार का मंच?”
जस्टिस बागची ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता मुकदमेबाजी के माध्यम से एक विशेष दृष्टिकोण को प्रचारित कर रही हैं। उन्होंने पूछा,
“क्या आप अपने अधिकारों को लागू करने के लिए यह मुकदमा दायर कर रही हैं या किसी विशेष दृष्टिकोण को प्रचारित करने के लिए, जो अपराध की सीमा तक पहुंच सकता है?”
जब याचिकाकर्ता ने “एक महिला होने के नाते” अपनी बात रखने की अनुमति मांगी, तो जस्टिस बागची ने कहा,
“एक महिला होते हुए आपने अन्य महिलाओं के बारे में किस तरह की टिप्पणियां की हैं?”
सुप्रीम कोर्ट ने दी हाईकोर्ट जाने की छूट
याचिकाकर्ता की ओर से अनुरोध किया गया कि पुलिस को वर्चुअल माध्यम से पूछताछ करने का निर्देश दिया जाए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह इस मामले की जांच का उपयुक्त मंच नहीं है और याचिकाकर्ता हाईकोर्ट का रुख कर सकती हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने सख्त लहजे में कहा,
“अगर यह सब किसी पुरुष ने लिखा होता, तो हम उसे यहीं गिरफ्तार करवा देते।”
अंततः पीठ ने याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट में अपील करने की स्वतंत्रता दे दी।
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