सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “सहकर्मी भावना न्यायिक स्वतंत्रता की साथी है” और अपील में निर्णय पलटना व्यक्तिगत अपमान नहीं, बल्कि संवैधानिक सुधार की प्रक्रिया है। कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर राजस्व रिकॉर्ड सुधारने के निर्देश दिए।
📰 सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों को याद दिलाया — ‘सहकर्मी भावना न्यायिक स्वतंत्रता की साथी है, अपील में उलटफेर व्यक्तिगत अपमान नहीं, बल्कि संवैधानिक सुधार की प्रक्रिया है’
नई दिल्ली | विधि संवाददाता:
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि देश के सभी न्यायाधीशों को यह याद रखना चाहिए कि “सहकर्मी भावना (Collegiality) न्यायिक स्वतंत्रता की सहचर है” और किसी निर्णय का अपील में उलट जाना “व्यक्तिगत अपमान नहीं बल्कि संवैधानिक व्यवस्था का सामान्य संचालन है, जो त्रुटियों को सुधारती और कानून को स्थिर करती है।”
⚖️ मामला और पीठ की टिप्पणी
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की दो-न्यायाधीशीय पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली 96 सिविल अपीलों पर निर्णय सुनाया, जिसमें राजस्व अभिलेखों (Revenue Records) में कुछ भूमि को “वन कार्यवाही से प्रभावित और राज्य में निहित” बताने वाले प्रविष्टियों में हस्तक्षेप से इनकार किया गया था।
पीठ ने कहा —
“भारत के सभी न्यायाधीशों को यह स्मरण रखना चाहिए कि सहकर्मी भावना, स्वतंत्रता की साथी है। अपील में निर्णय पलटना व्यक्तिगत अपमान नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था का स्वाभाविक संचालन है जो त्रुटियों को सुधारती और न्याय सुनिश्चित करती है। वरिष्ठ न्यायालयों के प्रति सम्मान अधीनता नहीं, बल्कि यह स्वीकारोक्ति है कि सभी न्यायालय न्याय के एक ही उद्देश्य की पूर्ति में लगे हैं।”
⚖️ “न्यायपालिका का बल अनुशासन से, न कि अधिकार से आता है”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान की संरचना न्यायिक अनुशासन पर आधारित है, न कि प्रभुत्व पर।
“संविधान का अनुच्छेद 141 इस न्यायालय द्वारा निर्धारित कानून को देश के हर न्यायालय पर बाध्यकारी बनाता है और अनुच्छेद 144 सभी न्यायिक व नागरिक प्राधिकरणों को इस न्यायालय की सहायता में कार्य करने का दायित्व देता है। ये महज औपचारिक घोषणाएं नहीं हैं, बल्कि न्यायिक एकता के संवैधानिक आश्वासन हैं जो एकसमान न्याय व्यवस्था को सुनिश्चित करते हैं।”
⚖️ “अपील व्यवस्था का उद्देश्य त्रुटि सुधार और विधि स्थायित्व है”
पीठ ने कहा कि अपीलीय न्यायाधिकार का अस्तित्व त्रुटियों को ठीक करने और कानून को एक समान बनाने के लिए है।
“जब कोई उच्च न्यायालय किसी निर्णय को पलटता या संशोधित करता है, तो अधीन न्यायालय को उस आदेश का पूर्ण और ईमानदारी से पालन करना चाहिए। न्यायिक आदेशों की अवज्ञा केवल पक्षकार को नहीं बल्कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता को भी हानि पहुंचाती है।”
कोर्ट ने “interest reipublicae ut sit finis litium” (अर्थात् “सार्वजनिक हित इसी में है कि वाद-विवाद का अंत हो”) का हवाला देते हुए कहा कि अंतिमता (Finality) समाज के लिए उतनी ही आवश्यक है जितनी न्याय के लिए।
⚖️ “न्यायिक अनुशासन न्यायिक सामंजस्य का आधार है”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा —
“न्यायिक अनुशासन वह आचार है जो न्यायिक श्रेणीकरण को सामंजस्य में बदलता है। यह संयम, विनम्रता और बाध्यकारी मिसालों के अनुपालन की अपेक्षा करता है, भले ही किसी न्यायाधीश की व्यक्तिगत राय भिन्न हो।”
कोर्ट ने आगे कहा कि किसी न्यायाधीश का कर्तव्य है कि वह मिसाल (Precedent) लागू करे और यदि आवश्यक हो तो बड़ी पीठ के समक्ष पुनर्विचार का सुझाव दे, परंतु कानून को दरकिनार नहीं कर सकता।
“Stare decisis et non quieta movere” — अर्थात “स्थापित निर्णयों पर टिके रहना और स्थिर मामलों को न छेड़ना” — केवल नारा नहीं, बल्कि कानून के समान व्यवहार की गारंटी है।
⚖️ “न्यायालय अपनी वैधता कारणों से पाते हैं, न कि भावनाओं से”
कोर्ट ने कहा कि सभी न्यायालय कारणों से बोलते हैं और ये कारण यदि बाध्यकारी मिसाल से मेल खाते हैं तो न्यायपालिका की वैधता और विश्वास दोनों को बनाए रखते हैं।
“अनुच्छेद 141 और 144 न्यायिक आदेशों के पालन को व्यक्तिगत पसंद नहीं बल्कि संवैधानिक कर्तव्य बनाते हैं।”
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुरूप व्यवहार नहीं किया और बाध्यकारी निर्णयों से बचने के लिए “गैर-प्रासंगिक भेदों” को निर्णायक बना दिया।
⚖️ सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने सभी 96 अपीलों को स्वीकार करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया, विवादित राजस्व प्रविष्टियों को निरस्त किया और राजस्व रिकॉर्ड में आवश्यक सुधार के निर्देश दिए।
केस का नाम- रोहन विजय नाहर और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य
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