गुरुग्राम POCSO केस में सुप्रीम कोर्ट सख्त, पुलिस की लापरवाही पर सवाल, एसआईटी जांच के आदेश

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गुरुग्राम POCSO केस में सुप्रीम कोर्ट सख्त, पुलिस जांच पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुग्राम में बच्ची के यौन उत्पीड़न मामले में पुलिस की लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाया, एसआईटी जांच के आदेश दिए और बाल कल्याण समिति व डॉक्टर की भूमिका पर भी सवाल उठाए।


गुरुग्राम POCSO मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

Supreme Court of India ने हरियाणा के गुरुग्राम में एक मासूम बच्ची के यौन उत्पीड़न मामले में पुलिस की जांच पर गंभीर सवाल उठाते हुए कड़ा संज्ञान लिया है। अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली को “शर्मनाक और असंवेदनशील” बताते हुए मामले की निष्पक्ष जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) गठित करने का निर्देश दिया।

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा कि यदि जांच एजेंसियां ही मामलों को कमजोर करेंगी, तो पीड़ितों को न्याय मिलना मुश्किल हो जाएगा और न्यायपालिका पर जनता का भरोसा प्रभावित होगा।


गंभीर अपराधों में हल्की धाराएं लगाने पर कोर्ट नाराज

मामले में सामने आया कि पुलिस ने POCSO Act के तहत दर्ज प्राथमिकी में गंभीर धाराएं लगाने के बजाय हल्की धाराएं लगाईं, जिससे अपराध की गंभीरता कम दिखाई दे। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई।

अदालत ने कहा कि यह जांच में लापरवाही या जानबूझकर मामले को कमजोर करने की कोशिश भी हो सकती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि जांच एजेंसियों का दायित्व है कि वे अपराध की गंभीरता के अनुसार सही धाराएं लगाएं और मजबूत साक्ष्य अदालत के सामने पेश करें।


निजी अस्पताल की डॉक्टर को भी फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में एक निजी अस्पताल की डॉक्टर की भूमिका पर भी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि बच्ची के बयान पर अपना रुख बदलना बेहद गंभीर बात है और इस तरह का व्यवहार न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।

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अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे संवेदनशील मामलों में डॉक्टर, पुलिस और बाल कल्याण संस्थाओं की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है, क्योंकि उनके आचरण पर ही जांच की दिशा निर्भर करती है।


बाल कल्याण समिति की भूमिका पर भी सवाल

अदालत ने स्थानीय बाल कल्याण समिति की भूमिका पर भी सवाल उठाए और समिति के सदस्यों को कारण बताओ नोटिस जारी किया। अदालत ने पूछा कि क्यों न उन्हें उनके पद से हटा दिया जाए।

इससे स्पष्ट है कि अदालत केवल पुलिस की भूमिका ही नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही तय करना चाहती है, ताकि बच्चों से जुड़े मामलों में लापरवाही न हो।


FIR दर्ज कराने में भी आती हैं मुश्किलें

अदालत की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब अक्सर यह देखा जाता है कि पीड़ित पक्ष को प्राथमिकी दर्ज कराने में भी कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। हालांकि कानून में Zero FIR का प्रावधान है, फिर भी कई मामलों में पुलिस क्षेत्राधिकार का बहाना बनाकर FIR दर्ज करने से बचती है।

कई मामलों में जांच एजेंसियों और अन्य संस्थाओं के बीच समन्वय की कमी या गठजोड़ के आरोप भी सामने आते रहे हैं, जिससे मामलों की जांच प्रभावित होती है।


NCRB रिपोर्ट: दोषसिद्धि दर में गिरावट

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार 2018 से 2022 के बीच बलात्कार मामलों में दोषसिद्धि दर लगभग 27-28 प्रतिशत रही, जो 2023 में घटकर 23 प्रतिशत से भी कम हो गई। यह स्थिति बताती है कि कड़े कानून होने के बावजूद आरोपियों को सजा दिलाने में जांच और साक्ष्य सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि दोषसिद्धि दर कम होने के पीछे मुख्य कारण हैं:

  • जांच में देरी
  • पर्याप्त साक्ष्य का अभाव
  • गवाहों का मुकर जाना
  • कमजोर चार्जशीट
  • मेडिकल और फोरेंसिक प्रक्रियाओं में कमी
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इन सभी के लिए प्राथमिक जिम्मेदारी जांच एजेंसियों की ही मानी जाती है।


निष्पक्ष जांच के लिए SIT का गठन

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए विशेष जांच दल (SIT) गठित करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि बच्चों से जुड़े यौन अपराधों में जांच अत्यंत संवेदनशील और पेशेवर तरीके से होनी चाहिए।

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि जांच एजेंसियां अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभातीं, तो अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ेगा।


निष्कर्ष

गुरुग्राम POCSO मामले में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप यह दिखाता है कि अदालतें अब केवल मुकदमे का फैसला ही नहीं बल्कि जांच प्रक्रिया की गुणवत्ता पर भी नजर रख रही हैं। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि बच्चों से जुड़े अपराधों में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और दोषियों को सजा दिलाने के लिए निष्पक्ष और मजबूत जांच जरूरी है।


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