सुप्रीम कोर्ट सख्त: ‘सुखना झील को और कितना सुखाओगे?’— बिल्डर माफिया–अफसर गठजोड़ पर कड़ी टिप्पणी

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सुखना झील के सूखने और पर्यावरणीय क्षति पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई। CJI सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने बिल्डर माफिया और नौकरशाही की मिलीभगत को जिम्मेदार ठहराया और ESZ के विस्तार पर पंजाब सरकार के रुख पर विचार किया।

सुप्रीम कोर्ट सख्त: ‘सुखना झील को और कितना सुखाओगे?’— बिल्डर माफिया–अफसर गठजोड़ पर कड़ी टिप्पणी

चंडीगढ़ स्थित सुखना झील के लगातार सूखने और उसके पारिस्थितिकी तंत्र को हो रहे गंभीर नुकसान पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को तीखी टिप्पणी की। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि झील विनाश के कगार पर है और इसके लिए बिल्डर माफिया तथा सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत जिम्मेदार है।

सुनवाई के दौरान CJI ने तीखे शब्दों में कहा, “सुखना झील, और कितना सुखाओगे सुखना झील को? यह विनाश के कगार पर है। बिल्डर माफिया नौकरशाही के राजनीतिक संरक्षण के साथ काम कर रहा है। आखिर ये बिल्डर माफिया कौन हैं?”

अरावली पर स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई के दौरान टिप्पणी

ये टिप्पणियां अरावली पर्वतमाला की परिभाषा से जुड़े उस स्वतः संज्ञान (suo motu) मामले की सुनवाई के दौरान आईं, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की परिभाषा को स्वीकार करने संबंधी अपने पहले के आदेश पर रोक लगा रखी है।

सुनवाई के दौरान अधिवक्ता अनुज कौशल ने पीठ के समक्ष सुखना झील का मुद्दा उठाया, जिस पर CJI ने तुरंत संज्ञान लेते हुए झील की बिगड़ती स्थिति पर गहरी नाराजगी जाहिर की।

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सुखना झील से जुड़ा लंबित विवाद

सुखना झील से जुड़ा मौजूदा मुकदमा मुख्य रूप से उसके कैचमेंट एरिया की सुरक्षा से संबंधित है। वर्ष 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने अवैध निर्माणों को गिराने का आदेश दिया था ताकि झील क्षेत्र में आगे अतिक्रमण रोका जा सके।

नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने नाडा गांव के निवासी तरसेम लाल की याचिका पर पंजाब सरकार, चंडीगढ़ प्रशासन और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था। इस याचिका में 1998 की उस अधिसूचना को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत सुखना वाइल्डलाइफ सैंक्चुरी घोषित करते हुए भूमि को पंजाब सरकार की संपत्ति बताया गया था।

ESZ पर पंजाब सरकार का हलफनामा

बुधवार को पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अनुपालन हलफनामा दाखिल किया। इसमें कोर्ट के 24 जुलाई 2024 के आदेश का हवाला दिया गया, जिसमें प्रस्तावित 100 मीटर के इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) को अपर्याप्त बताते हुए उसके विस्तार की जरूरत जताई गई थी।

पंजाब सरकार ने कोर्ट को बताया कि उसने ESZ को 1 किलोमीटर से 3 किलोमीटर तक बढ़ाने की सिफारिश करने का निर्णय लिया है, जो मंत्रिपरिषद की मंजूरी के अधीन होगा। सरकार के अनुसार, इस प्रस्ताव को मुख्यमंत्री द्वारा सैद्धांतिक मंजूरी मिल चुकी है।

ESZ में निर्माण को लेकर दिशा-निर्देश

हलफनामे में कहा गया:

  • सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा निर्देशों के अनुसार, ESZ के भीतर किसी भी उद्देश्य से स्थायी निर्माण की अनुमति नहीं है।
  • ESZ के बाहर 0.5 किलोमीटर के दायरे में किसी भी प्रकार का व्यावसायिक निर्माण प्रतिबंधित रहेगा।
  • 0.5 किलोमीटर से 1.25 किलोमीटर के बीच केवल कम घनत्व और कम ऊंचाई (अधिकतम 15 फीट) की इमारतों की अनुमति होगी।
  • 1.25 किलोमीटर से आगे, आवासीय भवनों सहित नए निर्माण की अनुमति दी जा सकेगी।
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सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी पर्यावरण संरक्षण, शहरी नियोजन और प्रशासनिक जवाबदेही के सवालों पर एक बार फिर न्यायपालिका के कड़े रुख को दर्शाती है।


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