“1985 का मामला अब भी लंबित दिखता है, यह गलत संदेश” – CJI सख्त
सुप्रीम कोर्ट ने 1984-85 से लंबित एमसी मेहता मामलों को बंद करने का प्रस्ताव दिया। CJI सूर्यकांत ने कहा—पुराने मामलों को अनावश्यक रूप से लंबित दिखाना न्यायिक व्यवस्था पर गलत प्रभाव डालता है; नई शिकायतें अलग याचिका में दायर हों।
पर्यावरण न्यायशास्त्र की आधारशिला माने जाने वाले Supreme Court of India में लंबित 40 साल पुराने एमसी मेहता मामलों पर सोमवार को तीखी टिप्पणी हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने संकेत दिया कि 1984-85 में दायर मूल जनहित याचिकाओं (PIL) को अब बंद करने का समय आ गया है, क्योंकि उनमें उठाए गए मूल मुद्दों का निस्तारण दशकों पहले हो चुका है।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण, लैंड सीलिंग और ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन (TTZ) से जुड़े पर्यावरणीय मामलों की निगरानी जारी रहेगी।
“1985 का मामला अब भी लंबित दिखता है, यह गलत संदेश”
CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने सुनवाई के दौरान नाराज़गी जताते हुए कहा कि अलग-अलग अंतरिम आवेदन (IA) दायर कर पुराने मामलों को तकनीकी रूप से “लंबित” दिखाया जा रहा है।
मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, “जब संसद में हमसे पूछा जाता है कि कितने पुराने मामले लंबित हैं, तो 1985 के केस आज भी पेंडिंग दिखते हैं। इससे गलत धारणा बनती है कि सुप्रीम कोर्ट ने दशकों से फैसला नहीं दिया।”
उन्होंने कहा कि नई शिकायतें पुराने एमसी मेहता मामलों में आवेदन के जरिए जोड़ने के बजाय स्वतंत्र याचिका के रूप में दायर की जानी चाहिए।
तीन प्रमुख रिट याचिकाएं
पीठ ने विशेष रूप से तीन मामलों का उल्लेख किया:
- W.P.(C) No. 13381/1984
- W.P.(C) No. 4677/1985
- W.P.(C) No. 13029/1985
अदालत ने कहा कि इनमें से कई मामलों पर बहुत पहले अंतिम निर्णय हो चुका है, लेकिन बाद में दायर अंतरिम आवेदनों के कारण ये तकनीकी रूप से अभी भी लंबित दिखाए जा रहे हैं।
बेंच ने निर्देश दिया कि इन तीनों मामलों को अलग-अलग तिथियों पर सूचीबद्ध किया जाए और सभी लंबित IA/MA को उसी दिन स्वतंत्र रूप से सुना जाए।
हाई कोर्ट को ट्रांसफर का संकेत
सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षकारों के वकीलों से पूछा कि इन मामलों को “पुराने फैसलों को दोबारा खोले बिना” कैसे प्रभावी तरीके से निपटाया जा सकता है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि जिन मुद्दों पर स्थानीय तथ्यात्मक जांच की आवश्यकता है, उन्हें संबंधित अधिकार क्षेत्र वाले हाई कोर्ट को भेजा जा सकता है।
यह कदम न्यायिक संसाधनों के बेहतर उपयोग और लंबित मामलों के बोझ को कम करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
पर्यावरणीय निगरानी जारी रहेगी
हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण, लैंड सीलिंग और Taj Trapezium Zone से जुड़े पर्यावरणीय संरक्षण के मुद्दों पर न्यायिक निगरानी जारी रहेगी।
एमसी मेहता द्वारा दायर मूल याचिकाओं ने भारतीय पर्यावरण कानून को नई दिशा दी थी। इन्हीं मामलों के जरिए प्रदूषण नियंत्रण, औद्योगिक नियमन और ऐतिहासिक स्मारकों की सुरक्षा को लेकर ऐतिहासिक दिशानिर्देश बने।
मार्च के पहले सप्ताह में अगली सुनवाई
CJI ने संकेत दिया कि इन मामलों पर मार्च के पहले सप्ताह में विस्तृत सुनवाई होगी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “हम इस तरह के दस्तावेज़ों और आवेदनों से तंग आ चुके हैं। 1985 के मामलों को अनावश्यक रूप से लंबित नहीं रहने देंगे।”
यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की उस मंशा को दर्शाती है, जिसके तहत अदालत अब पुराने और तकनीकी रूप से जीवित मामलों की सूची को व्यवस्थित कर वास्तविक लंबित मामलों की तस्वीर साफ करना चाहती है।
पर्यावरण न्याय के इतिहास में मील का पत्थर रहे एमसी मेहता बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले अब एक नए प्रशासनिक और न्यायिक पुनर्संरचना के दौर से गुजरते दिख रहे हैं।
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