सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका: मदरसा आयोग कानून पर दोबारा सुनवाई से इंकार

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सुप्रीम कोर्ट ने स्के. मोहम्मद रफ़ीक बनाम कंटाई हाई मदरसा (2020) मामले पर पुनर्विचार की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि पश्चिम बंगाल मदरसा सेवा आयोग अधिनियम, 2008 पहले ही वैध ठहराया जा चुका है और न्यायिक निर्णय मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता।

सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका: मदरसा आयोग कानून पर दोबारा सुनवाई से इंकार

मामला क्या है?

सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीशों की पीठ—जस्टिस दिपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह—ने एक रिट याचिका को खारिज कर दिया। इस याचिका में अनुरोध किया गया था कि स्के. मोहम्मद रफ़ीक बनाम कंटाई हाई मदरसा (2020) के फैसले पर दोबारा विचार किया जाए।

2020 में सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल मदरसा सेवा आयोग अधिनियम, 2008 को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया था और माना था कि अल्पसंख्यक संस्थानों में शिक्षकों की नियुक्ति पर राज्य के नियामक उपाय Article 30 का उल्लंघन नहीं करते।


याचिकाकर्ताओं की दलील

कंटाई रहमानिया हाई मदरसा की प्रबंध समिति और स्के. मोहम्मद अब्दुर रहमान ने दावा किया कि 2020 का फैसला Article 30 के तहत अल्पसंख्यक संस्थाओं के अधिकारों का उल्लंघन करता है।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले वसंत संपत दुपारे बनाम भारत संघ (2025) का हवाला दिया, जिसमें Article 32 के तहत मृत्युदंड मामलों में सज़ा के चरण को दोबारा खोलने की अनुमति दी गई थी।


सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

  • अदालत ने कहा कि वसंत संपत दुपारे का मामला केवल मृत्युदंड के मामलों तक सीमित है और यहां लागू नहीं होता।
  • पीठ ने कहा:
    “स्के. मोहम्मद रफ़ीक मामले में विस्तार से सुनवाई कर अधिनियम को वैध ठहराया गया था। याचिकाकर्ताओं का यह दावा कि यह निर्णय Article 30 अधिकारों का उल्लंघन करता है, पूरी तरह असंगत है।”
  • कोर्ट ने नरेश श्रीधर मिराजकर बनाम महाराष्ट्र राज्य (9-जज संविधान पीठ) का हवाला देते हुए कहा कि कोई भी न्यायिक निर्णय मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकता।
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नतीजा

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को दुरुपयोग (abuse of process) मानते हुए ₹1,00,000 का जुर्माना लगाकर खारिज कर दिया।

मामला: The Managing Committee, Contai Rahamania High Madrasah & Anr v. The State of West Bengal & Ors.

निर्णय दिनांक: 15-09-2025

👉 यह फैसला साफ़ करता है कि पहले से वैध ठहराए गए कानूनों पर दोबारा सुनवाई केवल विशेष संवैधानिक परिस्थितियों में ही हो सकती है।

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