Supreme Court directs Pon Manickavel and CBI to stay away from media regarding Tamil Nadu idol theft case investigation
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को तमिलनाडु के बहुचर्चित मूर्ति चोरी मामले में जांच की गरिमा को बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी करते हुए पूर्व आईपीएस अधिकारी ए. जी. पोन मणिकवेल को मीडिया को कोई भी साक्षात्कार देने या सार्वजनिक बयान देने से रोक दिया। साथ ही, CBI को भी निर्देश दिया गया कि वह इस मामले में किसी प्रकार की सार्वजनिक जानकारी या प्रेस बयान जारी न करे।
सुनवाई: सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने CBI द्वारा मणिकवेल की जमानत शर्तों में संशोधन हेतु दायर याचिका पर सुनवाई की। याचिका में कहा गया था कि मणिकवेल ने मीडिया में बयान देकर उच्च न्यायालय द्वारा दी गई पूर्व-जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया है।
मणिकवेल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एस. नागमुथु ने पीठ को सूचित किया कि उनके मुवक्किल ने स्वेच्छा से मीडिया से बात करना बंद कर दिया है और भविष्य में भी ऐसा नहीं करेंगे। इसपर कोर्ट ने मणिकवेल के आश्वासन को रेकॉर्ड पर लेते हुए उन्हें सख्त रूप से मीडिया से दूर रहने का आदेश दिया।
साथ ही कोर्ट ने CBI को भी निर्देशित किया कि वह मामले की जांच से जुड़ी कोई भी जानकारी या प्रेस विज्ञप्ति जारी न करे जिससे जांच प्रभावित हो सकती है।
अन्य शर्तें: पासपोर्ट और विदेश यात्रा पर रोक
मणिकवेल ने अदालत को यह भी आश्वासन दिया कि पासपोर्ट के नवीनीकरण के बाद वह उसे न्यायिक प्राधिकारी के समक्ष जमा कर देंगे, और विदेश यात्रा केवल कोर्ट की अनुमति से ही करेंगे।
पृष्ठभूमि: गहरी होती जांच और आरोपों का जाल
इस विवाद की जड़ 2005 में पलवूर मंदिर से मूर्ति चोरी से जुड़ी है, जिसमें पूर्व डीएसपी कादर बाचा, जो स्वयं आरोपी हैं, ने मणिकवेल पर गंभीर आरोप लगाए। बाचा का दावा है कि जब मणिकवेल ‘आइडल विंग’ का नेतृत्व कर रहे थे, उन्होंने जानबूझकर कुछ पुलिस अधिकारियों को झूठा फंसाया और उनकी छवि खराब की।
मद्रास हाईकोर्ट ने पूर्व में मणिकवेल को अग्रिम जमानत दी थी, इस शर्त के साथ कि वह CBI की जांच में पूरा सहयोग करेंगे और ऐसी कोई गतिविधि नहीं करेंगे जो जांच को प्रभावित करे। लेकिन बाद में यह आरोप लगे कि मणिकवेल ने मीडिया में बयान देकर इन शर्तों का उल्लंघन किया, जिसके चलते CBI सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी।
विधिक महत्व: “न्यायिक प्रक्रिया बनाम जनभावना”
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को मीडिया ट्रायल से बचाने की दृष्टि से अहम माना जा रहा है। जांच एजेंसी और आरोपी दोनों को सार्वजनिक मंच से दूर रखने का आदेश इस बात की पुष्टि करता है कि अदालतें यह सुनिश्चित करना चाहती हैं कि सत्य और न्याय केवल कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से सामने आए, न कि जनसंचार माध्यमों के दबाव में।
विधि विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश भविष्य के ऐसे कई संवेदनशील मामलों के लिए एक दिशा-निर्देशक मिसाल बन सकता है।
मामला : CBI बनाम ए. जी. पोन मणिकवेल
