सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल गलत जमानत आदेश या कानून का उल्लेख न होने से न्यायिक अधिकारी को ‘दागी ईमानदारी’ नहीं कहा जा सकता। 27 साल की सेवा के बाद हटाए गए जज को पूर्ण बकाया वेतन के साथ बहाल किया गया।
चार जमानत आदेशों में धारा 59-A MP Excise Act का स्पष्ट उल्लेख न होने पर 27 साल की निष्कलंक सेवा वाले न्यायिक अधिकारी की बर्खास्तगी रद्द; पूर्ण बकाया वेतन का आदेश
सिर्फ गलत जमानत आदेश से जज पर ‘दागी ईमानदारी’ का ठप्पा नहीं लगाया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली | न्यायिक संवाददाता
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल इस आधार पर कि किसी न्यायिक आदेश में किसी वैधानिक प्रावधान का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया, उसे बेईमानी या भ्रष्ट आचरण का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी की अपील स्वीकार करते हुए उनकी बर्खास्तगी को असंवैधानिक और मनमाना करार दिया।
यह मामला उन चार जमानत आदेशों से जुड़ा था, जिनमें MP Excise Act की धारा 59-A का स्पष्ट उल्लेख नहीं था, जबकि अन्य मामलों में उसी अधिकारी ने उक्त धारा का हवाला देकर जमानत खारिज की थी। इसी आधार पर अधिकारी को ‘दागी ईमानदारी’ (doubtful integrity) का टैग देकर सेवा से हटा दिया गया था।
कोर्ट का निर्णायक निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“यह अत्यंत खतरनाक सिद्धांत होगा कि जिन निर्णयों या आदेशों में किसी वैधानिक प्रावधान का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, उन्हें स्वतः ही बेईमान निर्णय मान लिया जाए।”
पीठ ने दो टूक कहा कि सिर्फ गलत आदेश या विवेकाधिकार के गलत प्रयोग के आधार पर, बिना किसी ठोस सामग्री के, न तो विभागीय कार्रवाई शुरू की जा सकती है और न ही किसी न्यायिक अधिकारी की ईमानदारी पर सवाल उठाया जा सकता है।
न्यायमूर्ति पारदीवाला की सशक्त पूरक राय
न्यायमूर्ति पारदीवाला ने अपने पूरक मत में कहा:
“किसी अधिकारी को ‘दागी ईमानदारी’ के दलदल में धकेलने के लिए मात्र शक या अंदेशा पर्याप्त नहीं है। ऐसा संदेह ऐसा होना चाहिए जिसे उपलब्ध सामग्री के आधार पर कोई विवेकशील व्यक्ति भी तार्किक रूप से स्वीकार कर सके।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि संभावना (mere possibility) और संभाव्यता का प्रबल संतुलन (preponderance of probability)—इन दोनों में मौलिक अंतर है। जब तक दूसरा तत्व मौजूद न हो, तब तक किसी न्यायिक अधिकारी पर भ्रष्टाचार का ठप्पा नहीं लगाया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
- अपीलकर्ता ने 31 अक्टूबर 1987 को सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के रूप में सेवा शुरू की
- 2003 में अतिरिक्त जिला न्यायाधीश पद पर पदोन्नति
- 2008 में पुष्टि
- 2011 में खर्गोन (MP) में प्रथम ADJ के रूप में पदस्थापना
इसी दौरान Excise Act के मामलों में जमानत आदेश पारित किए गए।
शिकायत और विभागीय कार्रवाई
- शिकायत में आरोप था कि Excise Act मामलों में जमानत देने के लिए रिश्वत ली जाती थी, वह भी स्टेनोग्राफर के माध्यम से
- शिकायत सामान्य और बिना विवरण की थी
- न तो किसी विशिष्ट आदेश का उल्लेख था, न ठोस साक्ष्य
प्रारंभिक जांच के बाद विभागीय कार्यवाही शुरू हुई।
दो में से एक आरोप पूरी तरह असिद्ध पाया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों माना कार्रवाई अवैध?
कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण तथ्यों पर जोर दिया:
- शिकायतकर्ता को जांच में गवाह के रूप में पेश नहीं किया गया
- अभियोजन पक्ष के गवाहों ने आरोपों का समर्थन नहीं किया
- सरकारी वकील ने स्वयं कहा कि जमानत आदेश कानूनी और उचित थे
- राज्य ने किसी भी आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती नहीं दी
- चारों जमानत आदेशों में कारण दर्ज थे, भले ही धारा 59-A का स्पष्ट उल्लेख न हो
- किसी भी प्रकार के बाहरी दबाव या भ्रष्ट मंशा का कोई साक्ष्य नहीं
कोर्ट ने कहा कि 14 अन्य मामलों में धारा 59-A का उल्लेख होना, अपने आप में यह साबित नहीं करता कि शेष 4 मामलों में जानबूझकर उल्लंघन हुआ।
हाईकोर्ट पर सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“हम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर कोई भी विवेकशील व्यक्ति उस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकता, जिस पर जांच अधिकारी और हाईकोर्ट पहुंचे।”
अंतिम आदेश
- बर्खास्तगी आदेश (02.09.2015) रद्द
- अपीलीय आदेश (17.03.2016) रद्द
- हाईकोर्ट का आदेश रद्द
- अधिकारी को सेवानिवृत्ति की आयु तक सेवा में निरंतर माना जाएगा
- पूर्ण बकाया वेतन और सभी सेवा लाभ देने का निर्देश
न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर अहम टिप्पणी
न्यायमूर्ति पारदीवाला ने चेताया कि बिना ठोस आधार के विभागीय कार्यवाही ही वह प्रमुख कारण है, जिसके चलते ट्रायल कोर्ट के जज जमानत देने से हिचकते हैं, और परिणामस्वरूप हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट बेल एप्लीकेशनों से भर जाते हैं।
“लोकतंत्र के सुचारू संचालन के लिए भय और पक्षपात से मुक्त न्यायपालिका अनिवार्य है।”
मामले का नाम:
Nirbhay Singh Suliya v. State of Madhya Pradesh
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