जमानत मांगने वाले आरोपितों को अपने पूर्व आपराधिक मामलों का हलफनामे में पूर्ण खुलासा करना होगा: SC
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जमानत याचिका दायर करने वाले प्रत्येक आरोपित को अपने पूर्व आपराधिक मामलों का हलफनामे के माध्यम से पूर्ण और निष्पक्ष खुलासा करना अनिवार्य है। अदालत ने इसे न्यायिक पारदर्शिता और निष्पक्षता के लिए आवश्यक बताया।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने जमानत याचिकाओं में पारदर्शिता और एकरूपता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा है कि जमानत मांगने वाले प्रत्येक आरोपित का यह दायित्व है कि वह अपने पूर्व आपराधिक मामलों का हलफनामे के माध्यम से पूर्ण, स्पष्ट और निष्पक्ष खुलासा करे।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि जमानत की मांग करने वाला आवेदक उन सभी महत्वपूर्ण तथ्यों को उजागर करने के लिए बाध्य है, जो न्यायालय के विवेक के प्रयोग को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं।
महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग
पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा:
“महत्वपूर्ण तथ्यों को दबाना, छिपाना या चुनिंदा रूप से प्रकट करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और यह आपराधिक न्याय प्रशासन की नींव पर प्रहार करता है।”
अदालत ने कहा कि जमानत का निर्णय न्यायिक विवेक पर आधारित होता है और यदि आवेदक पूर्व आपराधिक इतिहास को छिपाता है तो यह न्यायालय को गुमराह करने के समान है।
जमानत याचिका में किन तथ्यों का खुलासा अनिवार्य?
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि जमानत आवेदन में निम्नलिखित विवरण स्पष्ट रूप से शामिल किए जाएं:
- प्राथमिकी (FIR) संख्या और तिथि
- संबंधित पुलिस थाने का नाम
- जांच एजेंसी द्वारा लगाई गई धाराएं
- कथित अपराधों के लिए निर्धारित अधिकतम सजा
- आवेदक के विरुद्ध लंबित या पूर्व आपराधिक मामले
अदालत ने कहा कि ये विवरण न्यायिक निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं।
हाई कोर्ट और जिला न्यायपालिका को निर्देश
पीठ ने आदेश दिया:
“इस अदालत के रजिस्ट्रार (न्यायिक) इस निर्णय की प्रति सभी हाई कोर्टों के रजिस्ट्रार जनरल को भेजें। हाई कोर्ट अपने नियम बनाने की शक्तियों के अनुरूप प्रशासनिक निर्देश जारी करने या अपने-अपने नियमों में उपयुक्त प्रावधान शामिल करने की व्यवहार्यता की जांच कर सकते हैं।”
मार्गदर्शन के लिए इस निर्णय की प्रति जिला न्यायपालिका को भी भेजने का निर्देश दिया गया है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट की जमानत रद्द
यह निर्देश उस मामले में दिए गए, जिसमें वकीलों को फर्जी डिग्री प्रमाणपत्र जारी करने के आरोपित को इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा दी गई जमानत को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि जमानत याचिका में प्रासंगिक तथ्यों का पूर्ण खुलासा नहीं किया गया हो, तो यह जमानत आदेश की वैधता को प्रभावित कर सकता है।
न्यायिक पारदर्शिता की दिशा में अहम कदम
यह निर्णय जमानत संबंधी न्यायिक प्रक्रिया में एकरूपता, पारदर्शिता और जवाबदेही को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे भविष्य में जमानत याचिकाओं में तथ्यों को छिपाने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगने की संभावना है।
#SupremeCourt #BailLaw #CriminalJustice #JudicialTransparency #AllahabadHighCourt #Affidavit #CriminalProcedure #LegalNews #सुप्रीमकोर्ट #जमानत #आपराधिक_कानून #न्यायपालिका #कानूनी_समाचार
