राज्य बार काउंसिलों को ‘वैकल्पिक’ शुल्क वसूलने से रोका, केवल वैधानिक नामांकन शुल्क मान्य – Supreme Court
State Bar Councils barred from charging ‘optional’ fees, only statutory enrolment fee valid – Supreme Court
सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि राज्य बार काउंसिलें अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 24(1)(f) के तहत तय सीमा से अधिक नामांकन शुल्क नहीं वसूल सकतीं। अदालत ने कहा कि तथाकथित “वैकल्पिक शुल्क” भी पूरी तरह अस्वीकार्य हैं।
यह टिप्पणी एक अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें आरोप था कि 2024 के गौरव कुमार बनाम भारत संघ मामले में दिए गए निर्देशों का पालन नहीं हो रहा है। उस फैसले में नामांकन शुल्क की सीमा सामान्य/ओबीसी वर्ग के लिए ₹750 और एससी/एसटी वर्ग के लिए ₹125 तय की गई थी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि विशेष रूप से कर्नाटक राज्य बार काउंसिल इससे कई गुना अधिक शुल्क ले रही है।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) की ओर से अधिवक्ता मनन कुमार मिश्रा ने हलफनामा दाखिल करते हुए बताया कि 2024 के फैसले के तुरंत बाद सभी राज्य बार काउंसिलों को अनुपालन के निर्देश भेजे गए थे। अधिकांश काउंसिलों ने सीमा का पालन करने की सूचना दी, लेकिन कर्नाटक में पहचान पत्र, प्रशिक्षण और कल्याण निधि जैसी मदों के लिए “वैकल्पिक शुल्क” वसूला गया।
पीठ ने 2024 के फैसले के पैराग्राफ 109 का हवाला देते हुए कहा कि वैधानिक सीमा से अधिक शुल्क लेना संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19(1)(g) का उल्लंघन है। अदालत ने दोहराया—
“वैकल्पिक जैसा कुछ नहीं है। कोई भी राज्य बार काउंसिल या बीसीआई इस आड़ में शुल्क नहीं ले सकती।”
न्यायालय ने आदेश दिया कि कर्नाटक समेत सभी राज्य बार काउंसिलें तुरंत ऐसे शुल्क वसूलना बंद करें। इन टिप्पणियों के साथ अवमानना याचिका का निस्तारण किया गया, और 2024 के आदेश की बाध्यता को फिर से रेखांकित किया गया।
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