सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की निचली अदालत के दो जजों को गलत बेल आदेश पर फटकार लगाई और 7 दिन का विशेष न्यायिक प्रशिक्षण अनिवार्य किया। कोर्ट ने ₹6 करोड़ की ठगी के आरोपित दंपत्ति की बेल भी रद्द कर दी।
सुप्रीम कोर्ट: बेल देने में गंभीर त्रुटि, दो जजों को 7 दिन का विशेष प्रशिक्षण अनिवार्य
नई दिल्ली, 30 सितम्बर 2025 – सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की निचली अदालतों के दो न्यायिक अधिकारियों—एडिशनल चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट (ACMM) और सेशन जज—को 7 दिन के विशेष न्यायिक प्रशिक्षण से गुजरने का निर्देश दिया है। यह आदेश उस मामले में दिया गया, जिसमें इन जजों ने छह करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के आरोपित दंपत्ति को जमानत दे दी थी।
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
जस्टिस अहसनुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस एस. वी. एन. भट्टी की पीठ ने कहा:
“बेल के मामलों का निर्णय मुख्य रूप से तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए, न कि यांत्रिक तर्कों पर। इस मामले में स्पष्ट तथ्यात्मक स्थिति को देखते हुए जमानत नहीं दी जानी चाहिए थी।”
पीठ ने कहा कि न्यायालय अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट जाएगा यदि वह इस मामले में आँख मूंद ले कि किस तरह बेल दी गई और बाद में सेशन जज ने हस्तक्षेप से इंकार कर दिया।
प्रशिक्षण और संवेदनशीलता पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से कहा कि दिल्ली न्यायिक अकादमी में इन दोनों अधिकारियों के लिए 7 दिन का विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया जाए। इसमें विशेष जोर इस बात पर होगा कि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों को किस स्तर पर महत्व देना चाहिए और न्यायिक कार्यवाही को संवेदनशीलता से कैसे संचालित करना चाहिए।
पुलिस जांच का आदेश
पीठ ने दिल्ली पुलिस आयुक्त को भी निर्देश दिया कि वे स्वयं जांच अधिकारियों के आचरण की जांच करें और आवश्यक कार्रवाई करें।
जमानत रद्द और मामला
सुप्रीम कोर्ट ने धरम पाल सिंह राठौर और शिक्षा राठौर को दी गई जमानत रद्द कर दी। दोनों पर आरोप है कि उन्होंने M/s Netsity Systems Pvt Ltd कंपनी को जमीन हस्तांतरण के नाम पर ₹6 करोड़ की ठगी की। यह एफआईआर 2018 में दायर शिकायत पर दर्ज हुई थी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने भी बेल रद्द करने की याचिका पर उचित तथ्यों पर ध्यान नहीं दिया और मामले को केवल “जमानत रद्द” के नजरिए से देखा।
पीठ ने नोट किया कि पहले दौर की सुनवाई में हाईकोर्ट ने मामला मध्यस्थता के लिए भेजा था, लेकिन लगभग चार साल बीतने के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला और आखिरकार चार्जशीट दायर होने के बाद अग्रिम जमानत याचिकाएँ खारिज हो गईं।
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