“आपराधिक न्यायशास्त्र के स्थापित सिद्धांतों का स्पष्ट रूप से गलत अनुप्रयोग”
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का वह आदेश रद्द किया जिसमें नाबालिग से छेड़छाड़ के मामले में ‘रेप के प्रयास’ की धारा को कम किया गया था। पीठ ने कड़ा रुख अपनाते हुए POCSO के तहत सख्त आरोप बहाल किए और न्यायिक संवेदनशीलता पर दिशा-निर्देश बनाने को कहा।
“न्याय में मेरा विश्वास फिर से बहाल हुआ है।”
यह कहना है 11 वर्षीय पीड़िता की मां का, जिन्होंने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का स्वागत किया जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया गया। हाईकोर्ट ने दो आरोपियों के खिलाफ लगाए गए ‘रेप के प्रयास’ के आरोपों को घटाकर कम गंभीर अपराध मान लिया था।
पीड़िता की मां ने कहा कि कई महीनों की अनिश्चितता और मानसिक पीड़ा के बाद सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप ने उन्हें न्याय की उम्मीद लौटाई है।
उन्होंने कहा, “मुझे उम्मीद है कि अब किसी और बच्चे को अपनी बात मनवाने के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ेगा। यह फैसला उन बच्चों के लिए भी रास्ता खोलेगा जो खुद बोल नहीं सकते।”
उन्होंने यह भी बताया कि बाल अधिकार संगठनों के समर्थन ने उनके परिवार को कानूनी लड़ाई जारी रखने का साहस दिया।
सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख
तीन न्यायाधीशों की पीठ—मुख्य न्यायाधीश Surya Kant, न्यायमूर्ति Joymalya Bagchi और न्यायमूर्ति N.V. Anjaria—ने हाईकोर्ट के फैसले को “आपराधिक न्यायशास्त्र के स्थापित सिद्धांतों का स्पष्ट रूप से गलत अनुप्रयोग” करार दिया।
पीठ ने POCSO अधिनियम के तहत ‘रेप के प्रयास’ की सख्त धारा बहाल कर दी और कहा कि आरोपियों के कृत्य केवल ‘तैयारी’ नहीं बल्कि स्पष्ट रूप से ‘प्रयास’ की श्रेणी में आते हैं।
मामला नवंबर 2021 का है, जब कासगंज में दो आरोपियों ने कथित रूप से नाबालिग को घर छोड़ने के बहाने बाइक पर बैठाया, एक पुलिया के नीचे खींचकर ले गए और उसके कपड़े उतारने की कोशिश की। बच्ची की चीख सुनकर राहगीरों के पहुंचने से अपराध आगे नहीं बढ़ सका।
हालांकि मार्च 2025 में Allahabad High Court ने यह कहते हुए आरोपों को कम कर दिया था कि बच्ची का सीना पकड़ना और पायजामे की डोरी तोड़ना केवल ‘तैयारी’ है, न कि ‘रेप का प्रयास’।
एनजीओ की याचिका और सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
इस आदेश को चुनौती देते हुए 250 से अधिक बाल अधिकार संगठनों के नेटवर्क Just Rights for Children ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की थी।
संगठन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फूलका ने दलील दी कि बच्चों से जुड़े यौन अपराधों में किसी भी प्रकार की पूर्वाग्रहपूर्ण या त्रुटिपूर्ण व्याख्या न्याय के उद्देश्य को कमजोर करती है।
सुप्रीम कोर्ट ने न केवल हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया, बल्कि न्यायिक संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए।
न्यायिक संवेदनशीलता पर समिति गठित
पीठ ने National Judicial Academy को निर्देश दिया कि वह यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण को अधिक सहानुभूतिपूर्ण बनाने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश तैयार करने हेतु एक समिति गठित करे।
अदालत ने कहा कि समिति तीन महीने के भीतर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करे, जिसमें कानूनी सिद्धांतों और सर्वोत्तम प्रथाओं को उदाहरणों सहित स्पष्ट किया जाए। NGO नेटवर्क से भी सुझाव आमंत्रित किए गए हैं।
‘बच्चों के मामलों में पूर्वाग्रह की कोई जगह नहीं’
संगठन के राष्ट्रीय संयोजक रवि कांत ने फैसले को ऐतिहासिक बताया।
उन्होंने कहा, “यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि बच्चों के खिलाफ अपराधों को पूरी गंभीरता और संवेदनशीलता से देखा जाना चाहिए। न्याय में किसी प्रकार की पूर्वाग्रहपूर्ण सोच या तकनीकी व्याख्या की गुंजाइश नहीं है।”
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल एक पीड़िता के लिए न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि बच्चों से जुड़े यौन अपराधों में कानून की व्याख्या करते समय अदालतें संवेदनशील और सख्त दोनों रहेंगी।
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