पसमांदा मुसलमानों को OBC में शामिल करने को लेकर CJI ने कहा “आप हमसे कानून बनाने को कह रहे हैं”

पसमांदा मुसलमानों को OBC में शामिल करने की मांग खारिज – SC

सुप्रीम कोर्ट ने पसमांदा मुसलमानों को OBC में शामिल करने की मांग वाली याचिका खारिज की। CJI सूर्यकांत ने कहा—आरक्षण सूची में नई जाति या समुदाय जोड़ना सरकार और संसद का नीतिगत फैसला है, अदालत कानून नहीं बना सकती।


Supreme Court of India ने पसमांदा मुसलमानों को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में शामिल करने की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि आरक्षण सूची में किसी नई जाति या समुदाय को जोड़ना न्यायपालिका का नहीं, बल्कि सरकार और संसद का क्षेत्राधिकार है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत से कानून बनाने या नई श्रेणी तय करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

“आप हमसे कानून बनाने को कह रहे हैं”

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि पसमांदा मुसलमान सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हैं, इसलिए उन्हें भी OBC के समान आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। इस पर CJI सूर्यकांत ने कहा,

“आप हमसे कानून बनाने के लिए कह रहे हैं। आप चाहते हैं कि हम मुसलमानों के एक विशेष वर्ग को OBC में शामिल करने पर विचार करें। यह हमारा कार्यक्षेत्र नहीं है।”

पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि OBC का दर्जा केवल जाति-आधारित पहचान से तय नहीं होता, बल्कि इसके लिए सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन के ठोस आंकड़ों और व्यापक सर्वेक्षण की आवश्यकता होती है।

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न्यायपालिका तय नहीं कर सकती श्रेणी

सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल उठाया कि न्यायपालिका कैसे यह तय कर सकती है कि मुसलमानों के भीतर कौन-सी श्रेणी पिछड़ी है और कौन नहीं।

CJI ने पूछा, “क्या हम यह निर्धारित करें कि मुसलमानों की एक श्रेणी पिछड़ी है और दूसरी नहीं? यह आकलन करना न्यायालय के दायरे में नहीं आता।”

अदालत ने कहा कि इस प्रकार के वर्गीकरण के लिए सामाजिक न्याय आयोगों, विशेषज्ञ समितियों और सरकार द्वारा किए गए विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता होती है।

अनुच्छेद 32 के तहत संभव नहीं

याचिकाकर्ता के वकील ने आंध्र प्रदेश में मुसलमानों के भीतर OBC वर्गीकरण और 4% आरक्षण से जुड़े लंबित मामले का हवाला दिया।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका में इस प्रकार के जटिल और नीतिगत निर्णय नहीं लिए जा सकते।

पीठ ने कहा कि आरक्षण सूची में किसी समुदाय को शामिल करना व्यापक नीति निर्धारण का विषय है, जो कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है।

पसमांदा मुसलमान कौन?

‘पसमांदा’ शब्द का अर्थ है ‘पीछे छूटे हुए’। पसमांदा मुसलमान उन समुदायों का समूह है, जिन्हें सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित माना जाता है। विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा लंबे समय से मांग की जा रही है कि इन्हें मुख्यधारा के OBC आरक्षण का लाभ मिले।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस संबंध में कोई भी पहल सरकार और संसद के स्तर पर ही की जा सकती है।

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नीति बनाम न्यायिक समीक्षा

यह आदेश एक बार फिर न्यायपालिका और विधायिका के बीच शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत को रेखांकित करता है। अदालत ने संकेत दिया कि वह नीति निर्माण में हस्तक्षेप नहीं करेगी, जब तक कि किसी मौजूदा नीति की वैधता या संवैधानिकता को चुनौती न दी जाए।

इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि आरक्षण संबंधी दावे डेटा, सर्वेक्षण और विधायी प्रक्रिया के माध्यम से ही आगे बढ़ाए जा सकते हैं—न कि सीधे अदालत से आदेश प्राप्त कर।


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