🧾 सुप्रीम कोर्ट ने कहा— ‘यह याचिका दाखिल ही नहीं होनी चाहिए थी’
रिपोर्ट | लीगल ब्यूरो
दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा को नकदी बरामदगी विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट से तीखी टिप्पणी का सामना करना पड़ा।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एजी मसीह की पीठ ने स्पष्ट कहा कि “ऐसी याचिका दाखिल ही नहीं की जानी चाहिए थी”।
याचिका में जस्टिस वर्मा ने उनके खिलाफ पूर्व मुख्य न्यायाधीश द्वारा गठित तीन-सदस्यीय आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट को रद्द करने की मांग की थी। उक्त रिपोर्ट में उन्हें नकदी प्रकरण में दोषी ठहराया गया था।
🔍 सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिका की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा कि मांगी गई प्राथमिक राहत तो सीधे सुप्रीम कोर्ट की प्रक्रिया को चुनौती देती है। कोर्ट ने पूछा कि याचिका में जांच रिपोर्ट को संलग्न क्यों नहीं किया गया, और पक्षकारों का उल्लेख स्पष्ट क्यों नहीं किया गया।
⚖️ कपिल सिब्बल की दलील
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, जो न्यायमूर्ति वर्मा की ओर से पेश हुए, ने तर्क दिया कि यह मामला भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 Article 124 के तहत आता है, जो सर्वोच्च न्यायालय के गठन और न्यायाधीशों की नियुक्ति/हटाने की प्रक्रिया को निर्धारित करता है। उन्होंने कहा कि—
“न्यायिक प्रक्रिया के तहत किसी न्यायाधीश के खिलाफ सार्वजनिक बहस, मीडिया में आरोप या सोशल मीडिया पर वीडियो अपलोड करना उचित नहीं है।”
🔍 पीठ का सवाल: जांच समिति के सामने क्यों पेश हुए?
हालांकि, पीठ ने कटाक्ष करते हुए पूछा:
“आप जांच समिति के सामने पेश क्यों हुए? क्या आप यह सोचकर गए थे कि शायद रिपोर्ट आपके पक्ष में आ जाए?”
🧾 पृष्ठभूमि
यह मामला तब प्रकाश में आया जब न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ एक गोपनीय जांच में नकदी की कथित बरामदगी को लेकर रिपोर्ट तैयार की गई। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रिपोर्ट को अमान्य घोषित करने की मांग की थी।
📌 निष्कर्ष
यह मामला भारत की न्यायिक व्यवस्था में संवेदनशील संतुलन का प्रतीक बन गया है—जहां एक ओर न्यायाधीशों की निजता और प्रतिष्ठा, और दूसरी ओर पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग के बीच गहन सवाल खड़े हो रहे हैं।
