“मर्दानगी पर सवाल अपमानजनक, लेकिन आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं”: सुप्रीम कोर्ट ने 306 IPC के तहत आरोप खारिज किए

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“मर्दानगी पर सवाल अपमानजनक, लेकिन आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं”: सुप्रीम कोर्ट ने 306 IPC के तहत आरोप खारिज किए

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि किसी व्यक्ति की मर्दानगी पर सवाल उठाना या उसे नपुंसक कहकर अपमानित करना, चाहे जितना भी अपमानजनक क्यों न हो, अपने-आप में आत्महत्या के लिए उकसावा (abetment of suicide) नहीं माना जा सकता — खासकर जब कथित टिप्पणी और आत्महत्या की घटना के बीच काफी समय का अंतर हो।

न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के उस निर्णय को रद्द कर दिया, जिसमें हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं द्वारा धारा 482 CrPC के तहत दायर याचिका को खारिज करते हुए उनके खिलाफ धारा 306 IPC के तहत आरोप पत्र को वैध ठहराया था।

कोर्ट की टिप्पणी:

पीठ ने कहा:

“भले ही कथित टिप्पणी मृतक की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली हो, लेकिन जब इस टिप्पणी और आत्महत्या के बीच लगभग एक माह का अंतर हो और कोई संपर्क न हो, तब इसे इतनी गंभीर उकसावन नहीं माना जा सकता कि कोई सामान्य व्यक्ति आत्महत्या जैसा कदम उठाए।”

वकीलों की प्रस्तुति:

  • याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका एम. जॉन और रचना श्रीवास्तव पेश हुईं।
  • राज्य की ओर से वरिष्ठ अतिरिक्त महाधिवक्ता वी. कृष्णमूर्ति ने पक्ष रखा।

मामला क्या था?

अभियोजन पक्ष का आरोप था कि याचिकाकर्ताओं द्वारा की गई लगातार गाली-गलौज और मानसिक उत्पीड़न के चलते मृतक ने आत्महत्या कर ली। यह भी आरोप था कि याचिकाकर्ताओं ने मृतक को नपुंसक और बांझ कहकर अपमानित किया, जिससे मानसिक क्षोभ हुआ।

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सुप्रीम कोर्ट की कानूनी व्याख्या:

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:

“धारा 306 के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए पहले यह स्थापित होना चाहिए कि व्यक्ति ने आत्महत्या की, और फिर यह कि आत्महत्या के लिए उकसावे के तत्व धारा 107 में पाए जाएं।”

धारा 107 IPC के अनुसार, उकसावे के तीन तत्व होते हैं:

  1. जानबूझकर प्रेरणा (instigation) देना,
  2. साजिश में शामिल होना,
  3. सहायता प्रदान करना (intentional aiding)।

कोर्ट ने कहा:

“सिर्फ गाली-गलौज या अपमानजनक भाषा प्रयोग करना, बिना किसी स्पष्ट mens rea (दोषसिद्ध मानसिकता) के, आत्महत्या के लिए उकसावे की श्रेणी में नहीं आता। याचिकाकर्ताओं की ओर से ऐसा कोई स्पष्ट इरादा नहीं दिखता जिससे मृतक को आत्महत्या के लिए उकसाया गया हो।”

कोर्ट का निष्कर्ष:

“चूंकि आरोपों में आत्महत्या के लिए उकसावे का तत्व स्पष्ट नहीं है, और कोई निरंतर उत्पीड़न का प्रमाण नहीं है, ऐसे में याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही को जारी नहीं रखा जा सकता।”

निर्णय:

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए 13 अप्रैल 2018 को मद्रास हाईकोर्ट द्वारा पारित निर्णय को रद्द कर दिया और आरोपपत्र को निरस्त कर दिया

मामला: Shenbagavalli & Ors. v. The Inspector Of Police, Kancheepuram District & Anr.

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