सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए तैयार याचिका: वक्फ संपत्तियों के रजिस्ट्रेशन की समयसीमा बढ़ाने की मांग

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सुप्रीम कोर्ट ने AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी की ओर से दायर आवेदन पर सुनवाई के लिए सहमति जताई है, जिसमें UMEED पोर्टल पर सभी वक्फ संपत्तियों के अनिवार्य पंजीकरण की समयसीमा बढ़ाने की मांग की गई है।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए तैयार याचिका: वक्फ संपत्तियों के रजिस्ट्रेशन की समयसीमा बढ़ाने की मांग


सुप्रीम कोर्ट में वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण की समयसीमा बढ़ाने की याचिका पर सुनवाई होगी

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को वक्फ संपत्तियों (Waqf Properties) के पंजीकरण की निर्धारित समयसीमा बढ़ाने से जुड़ी एक याचिका को सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई। यह याचिका AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी की ओर से दाखिल की गई है, जिसमें कहा गया है कि UMEED पोर्टल पर सभी वक्फ संपत्तियों — जिसमें Waqf-by-user संपत्तियाँ भी शामिल हैं — का पंजीकरण करने के लिए निर्धारित छह महीने की अवधि अपर्याप्त है।


CJI BR गवई की बेंच ने दी सूचीबद्ध करने की अनुमति

मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई (CJI BR Gavai) की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस आवेदन पर विचार करने की सहमति जताई।
वकील निज़ाम पाशा, जो ओवैसी की ओर से पेश हुए, ने कहा कि वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 में पंजीकरण की प्रक्रिया के लिए छह महीने का समय निर्धारित किया गया है, परंतु इस अवधि में से पांच महीने अदालत में सुनवाई और निर्णय प्रक्रिया में निकल चुके हैं, जिससे अब केवल एक महीना शेष है।

उन्होंने कहा,

“हमारे पास अब केवल एक महीना बचा है, जबकि हजारों संपत्तियों का पंजीकरण पूरा होना बाकी है। इसलिए, समयसीमा बढ़ाना आवश्यक है।”

मुख्य न्यायाधीश गवई ने कहा,

“इसे सूचीबद्ध किया जाए। सूचीबद्ध करना यह नहीं दर्शाता कि याचिका स्वीकार कर ली गई है।”


UMEED पोर्टल पर वक्फ संपत्तियों का अनिवार्य अपलोड

UMEED पोर्टल के तहत भारत की सभी वक्फ संपत्तियों का विवरण छह महीनों के भीतर अपलोड करना अनिवार्य किया गया है। इसमें वे संपत्तियाँ भी शामिल हैं जिन्हें Waqf-by-user के रूप में मान्यता प्राप्त है — यानी ऐसी संपत्तियाँ जिन्हें लंबे समय तक धार्मिक या जनकल्याणकारी कार्यों के लिए उपयोग में लाया गया है, भले ही उनके लिए किसी औपचारिक वक्फ घोषणा का दस्तावेज मौजूद न हो।

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15 सितंबर के अंतरिम आदेश का संदर्भ

इससे पहले, 15 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में Waqf (Amendment) Act, 2025 की सभी धाराओं पर रोक लगाने से इंकार कर दिया था। हालांकि, उसने कुछ विवादास्पद प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाई थी, जब तक कि अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अंतिम निर्णय नहीं हो जाता।

शीर्ष अदालत ने उस प्रावधान को स्थगित (stay) किया था, जिसमें यह कहा गया था कि केवल वे ही व्यक्ति वक्फ बना सकते हैं जो पिछले पांच वर्षों से इस्लाम का पालन कर रहे हों।
कोर्ट ने यह भी कहा था कि केंद्र द्वारा Waqf-by-user प्रावधान को हटाना “prima facie मनमाना नहीं” प्रतीत होता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि “वक्फ संपत्तियों को सरकारों द्वारा हड़पने का तर्क कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है।”


संवैधानिक चुनौती जारी

यह पूरा विवाद उन कई याचिकाओं से जुड़ा है जिनमें वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह संशोधन मुस्लिम समुदाय के अधिकारों का उल्लंघन करता है और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) के खिलाफ है।


कानूनी महत्व

यह मामला न केवल वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़ा है, बल्कि यह धार्मिक ट्रस्टों की पारदर्शिता और सरकारी निगरानी की सीमाओं पर भी सवाल उठाता है। यदि समयसीमा बढ़ाने का अनुरोध स्वीकार किया जाता है, तो यह देशभर में चल रहे वक्फ संपत्ति पंजीकरण अभियान को प्रभावित कर सकता है।

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वहीं, यदि कोर्ट समयसीमा बढ़ाने से इनकार करता है, तो हजारों वक्फ संपत्तियाँ अपंजीकृत रह सकती हैं, जिससे कानूनी विवाद और स्वामित्व संबंधी दावे और जटिल हो जाएंगे।


निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय वक्फ संपत्ति कानून में चल रहे संवैधानिक विवादों के बीच एक अहम मोड़ साबित हो सकता है। UMEED पोर्टल पर पंजीकरण की समयसीमा बढ़ाने को लेकर होने वाली आगामी सुनवाई मुस्लिम धार्मिक संस्थाओं और वक्फ बोर्डों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

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