सुप्रीम कोर्ट ने 5 वर्षीय इंटीग्रेटेड एलएलबी को 4 वर्ष करने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि कानूनी शिक्षा नीति पर अदालत अपने विचार नहीं थोप सकती। कोर्ट ने सभी हितधारकों से व्यापक विचार-विमर्श की आवश्यकता बताई।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पांच वर्षीय एकीकृत एलएलबी पाठ्यक्रम को चार वर्ष करने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि कानूनी शिक्षा से जुड़े नीतिगत मुद्दों पर अदालत अपने विचार नहीं थोप सकती। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस तरह के प्रश्नों पर निर्णय लेने से पहले सभी संबंधित हितधारकों के बीच व्यापक विचार-विमर्श आवश्यक है।
यह मामला मुख्य न्यायाधीश SuryaKant और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष आया, जो अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में विधि शिक्षा के ढांचे, पाठ्यक्रम और अवधि की समीक्षा के लिए प्रख्यात न्यायविदों से मिलकर एक विधिक शिक्षा आयोग गठित करने का निर्देश देने की मांग की गई है।
सुनवाई के दौरान अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने 2025 में दायर अपनी याचिका का मौखिक रूप से उल्लेख करते हुए मामले को तत्काल सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया। उन्होंने दलील दी कि भारत में अधिकांश पेशेवर पाठ्यक्रम चार वर्ष के होते हैं, जबकि कक्षा 12 के बाद एलएलबी का एकीकृत कोर्स पांच वर्षों का है।
उपाध्याय ने अदालत से कहा, “यह जनहित याचिका है जिसमें विधि शिक्षा के पाठ्यक्रम को तैयार करने के लिए प्रख्यात न्यायविदों से युक्त एक विधिक शिक्षा आयोग के गठन की मांग की गई है। सीए, बी.टेक जैसे सभी व्यावसायिक पाठ्यक्रम चार वर्ष के हैं, जबकि इंटर के बाद एलएलबी पांच वर्ष की है। इससे सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को विधि शिक्षा की ओर आकर्षित करने में कठिनाई होती है।”
इन दलीलों पर प्रतिक्रिया देते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कानूनी शिक्षा से संबंधित नीति निर्धारण का विषय केवल न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर शिक्षाविदों, न्यायविदों, बार संगठनों, नीति विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों के बीच व्यापक चर्चा आवश्यक है।
मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान भारत में पांच वर्षीय विधि पाठ्यक्रम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आम धारणा के विपरीत, पांच वर्षीय एलएलबी कार्यक्रम की शुरुआत नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु से नहीं हुई थी।
उन्होंने कहा, “पांच वर्षीय पाठ्यक्रम शुरू करने वाला संस्थान बेंगलुरु का नेशनल लॉ स्कूल नहीं था, बल्कि महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक था। इसका पहला बैच लगभग 1982 या 1983 में शुरू हुआ था।”
पीठ ने आगे स्पष्ट किया कि न्यायपालिका इस विषय में शामिल कई हितधारकों में से केवल एक है और वह अकेले इस तरह की नीतिगत दिशा तय नहीं कर सकती।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “न्यायपालिका केवल एक हितधारक है। हम अपने विचार थोप नहीं सकते। इस विषय में शिक्षाविद, न्यायविद, बार एसोसिएशन, सामाजिक और नीति शोधकर्ता भी शामिल हैं। इस पर व्यापक विचार-विमर्श होना चाहिए।”
सुनवाई के दौरान जब उपाध्याय ने कहा कि कई विश्वविद्यालयों के कुलपति भी पांच वर्षीय पाठ्यक्रम के पक्ष में नहीं हैं, तो अदालत ने सवाल उठाया कि यदि विश्वविद्यालय स्वयं इस संरचना के विरोध में हैं तो न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता क्यों है।
मुख्य न्यायाधीश ने पूछा, “अगर विश्वविद्यालय ही इसके खिलाफ हैं, तो वे स्वयं इसकी अवधि कम क्यों नहीं कर सकते? इसके लिए अदालत की क्या जरूरत है?”
इस पर उपाध्याय ने जवाब दिया कि इस मामले में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को भी निर्णय लेना होगा, क्योंकि वही विधि शिक्षा और अधिवक्ता पेशे से जुड़े नियमों को नियंत्रित करता है।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को आगे की सुनवाई के लिए अप्रैल 2026 में सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।
याचिका में अधिवक्ता उपाध्याय ने यह भी आरोप लगाया है कि पांच वर्षीय बीए-एलएलबी या बीबीए-एलएलबी पाठ्यक्रम की अवधि पाठ्यक्रम सामग्री के अनुपात में अत्यधिक लंबी है। उनका कहना है कि इससे छात्रों और उनके परिवारों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ पड़ता है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि लंबी अवधि के कारण मध्यम और निम्न आय वर्ग के छात्रों को अधिक वित्तीय दबाव झेलना पड़ता है और उन्हें अपने परिवार का आर्थिक सहारा बनने में दो वर्ष अतिरिक्त लग जाते हैं।
इसके अलावा याचिका में केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की गई है कि वह प्रख्यात शिक्षाविदों, न्यायविदों, सेवानिवृत्त न्यायाधीशों, अधिवक्ताओं और प्रोफेसरों से मिलकर एक विशेषज्ञ समिति या विधिक शिक्षा आयोग का गठन करे। यह आयोग एलएलबी और एलएलएम पाठ्यक्रमों के सिलेबस, पाठ्यक्रम संरचना और अवधि की व्यापक समीक्षा कर सके।
याचिकाकर्ता ने नई शिक्षा नीति 2020 का हवाला देते हुए कहा है कि इस नीति में अधिकांश स्नातक पाठ्यक्रमों को चार वर्ष का बनाने की दिशा में जोर दिया गया है, लेकिन बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने अभी तक विधि पाठ्यक्रमों की अवधि और संरचना की समीक्षा के लिए ठोस कदम नहीं उठाए हैं।
गौरतलब है कि इससे पहले भी उपाध्याय ने कक्षा 12 के बाद पांच वर्षीय एलएलबी पाठ्यक्रम को समाप्त कर तीन वर्षीय पाठ्यक्रम लागू करने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। अप्रैल 2024 में उस याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने टिप्पणी की थी कि पांच वर्षीय पाठ्यक्रम ने विधि शिक्षा को काफी लाभ पहुंचाया है और इस पेशे में परिपक्व लोगों की आवश्यकता होती है।
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