ओडिशा हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: विवाह के झूठे वादे पर बलात्कार का आरोप खारिज

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ओडिशा उच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण फैसले की चर्चा की गई है, जिसमें अदालत ने नौ वर्षों तक संबंध में रहने के बाद विवाह का वादा पूरा न करने के आधार पर लगाए गए बलात्कार के आरोपों को खारिज कर दिया।

ओडिशा उच्च न्यायालय ने एक मामले में एक व्यक्ति के खिलाफ बलात्कार के आरोपों को खारिज कर दिया गया, जिस पर लगभग नौ वर्षों की अवधि में एक महिला/शिकायतकर्ता के साथ बार-बार यौन संबंध बनाने का आरोप था।

मामले की पृष्ठभूमि:
मामला मनोज कुमार मुंडा बनाम ओडिशा राज्य (CRLMC No. 4485/2024) से संबंधित है, जिसमें शिकायतकर्ता महिला ने आरोपी के खिलाफ झूठे विवाह के वादे पर यौन संबंध बनाने के आरोप लगाए थे।

अदालत का निर्णय:
न्यायमूर्ति डॉ. संजीब कुमार पाणिग्रही की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रेम संबंध का विवाह में परिणत न होना व्यक्तिगत असंतोष का विषय हो सकता है, लेकिन इसे अपराध नहीं माना जा सकता।

अदालत ने कहा कि कानून हर टूटे हुए वादे की रक्षा नहीं करता और न ही हर असफल संबंध को आपराधिक ठहराता है। यदि दो वयस्क आपसी सहमति से संबंध बनाते हैं, तो बाद में शादी न होने को धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता।

महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ:

  • महिला ने नागरिक मुकदमे में स्वयं यह दावा किया था कि उनकी शादी पहले ही हो चुकी थी।
  • बलात्कार के आरोप को साबित करने के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि सहमति धोखे या दबाव के कारण दी गई थी।
  • अदालत ने बलात्कार कानूनों के गलत इस्तेमाल पर भी चिंता जताई और कहा कि न्यायिक प्रक्रिया को व्यक्तिगत प्रतिशोध का माध्यम नहीं बनने दिया जा सकता।

निष्कर्ष:
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में अभियोग जारी रखना कानून का दुरुपयोग होगा और इसलिए, धारा 482 सीआरपीसी के तहत कार्यवाही को खारिज कर दिया। यह निर्णय स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि कानून को केवल वास्तविक अपराधों को संबोधित करना चाहिए, न कि व्यक्तिगत संबंधों की विफलता को।

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वाद शीर्षक – मनोज कुमार मुंडा बनाम ओडिशा

 

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