सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चों की कस्टडी तय करते समय केवल ‘बाल कल्याण’ ही नहीं, बल्कि माता-पिता की आर्थिक क्षमता, जीवन स्तर, शिक्षा और बच्चों की सुविधा जैसे कारकों पर भी विचार जरूरी है। हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर मामला पुनर्विचार के लिए लौटाया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने दो नाबालिग बच्चों की अभिरक्षा (custody) से जुड़े एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि बाल कल्याण (child welfare) भले ही सर्वोपरि हो, लेकिन यह एकमात्र निर्णायक कसौटी नहीं हो सकती। अदालत ने कहा कि माता-पिता की आर्थिक स्थिति, जीवन स्तर, बच्चों की शिक्षा और उनका समग्र आराम जैसे कारक भी कस्टडी तय करते समय प्रासंगिक और महत्वपूर्ण हैं।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर सुनवाई के दौरान की।
हाईकोर्ट ने प्रासंगिक तथ्यों की अनदेखी की: SC
शीर्ष अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट यह मानने में सही नहीं था कि उपरोक्त कारकों की कोई खास भूमिका नहीं है और कस्टडी का फैसला केवल बाल कल्याण पर आधारित होना चाहिए। अदालत के अनुसार, हाईकोर्ट ने कई महत्वपूर्ण और प्रासंगिक पहलुओं पर विचार ही नहीं किया, जिससे उसका आदेश टिकाऊ नहीं रह गया।
कतर कोर्ट के आदेश की अहमियत
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि कतर की फैमिली कोर्ट के फैसले के प्रभाव को हाईकोर्ट ने नजरअंदाज कर दिया। कतर कोर्ट ने पत्नी को बच्चों की कस्टडी दी थी, लेकिन गार्जियनशिप पिता के पक्ष में थी, और पासपोर्ट भी पिता के पास थे। बाद में कस्टडी आदेश के प्रभावी न रहने की स्थिति में यह तथ्य बच्चों की अभिरक्षा तय करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।
अवमानना आदेश और आचरण भी प्रासंगिक
अदालत ने कहा कि पत्नी द्वारा दिए गए आश्वासन का उल्लंघन करने से जुड़ा अवमानना आदेश अंतिम रूप ले चुका है, और ऐसे में वह अपने आचरण से पीछे नहीं हट सकती। वहीं, पति के खिलाफ लगाए गए दुर्व्यवहार और हमले के आरोपों पर कतर कोर्ट द्वारा क्लीन चिट दिए जाने का भी संज्ञान लिया गया।
बच्चों की इच्छा को भी दिया गया महत्व
मध्यस्थता रिपोर्ट का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों बच्चों ने स्पष्ट रूप से पिता के साथ रहने की इच्छा जताई। बच्चों ने कतर में रहने और वहां जीवन को देखने की उत्सुकता व्यक्त की। छोटे बच्चे ने पिता के साथ जाने की इच्छा बार-बार दोहराई और बातचीत के दौरान व्यथित भी नजर आया।
अदालत ने यह भी नोट किया कि दोनों बच्चे केवल अंग्रेज़ी बोलते हैं और स्थानीय बच्चों से संवाद करने में उन्हें कठिनाई हो रही है।
मामला पुनर्विचार के लिए लौटाया गया
इन सभी पहलुओं को नजरअंदाज किए जाने को गंभीर मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और मामले को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया, यह निर्देश देते हुए कि इस पर चार महीने के भीतर यथाशीघ्र फैसला किया जाए।
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