नाबालिग पर सर्जरी विवाद में डॉक्टर के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग पर सर्जरी विवाद में डॉक्टर के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द करते हुए कहा कि वैध सहमति और चिकित्सकीय रूप से उचित प्रक्रिया होने पर मुकदमा चलाना कानून का दुरुपयोग है।
📌 पृष्ठभूमि: नाबालिग की सर्जरी पर आपराधिक विवाद
S. Balagopal v. State of T.N. में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक संवेदनशील आपराधिक अपील आई, जिसमें आरोप था कि एक सर्जन ने नाबालिग बच्चे पर बिना वैध सहमति के अलग सर्जरी कर दी।
मामला तब शुरू हुआ जब शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उसके डेढ़ वर्षीय पुत्र को Undescended Testicle के इलाज के लिए Orchidopexy सर्जरी हेतु भर्ती किया गया था, लेकिन डॉक्टर ने Orchidectomy (टेस्टिकल हटाना) कर दिया।
⚖️ आरोप: सहमति में हेरफेर और फर्जीवाड़े का दावा
शिकायतकर्ता के अनुसार:
- Orchidectomy के लिए कोई सहमति नहीं ली गई
- सर्जरी के बाद सहमति पत्र में हेरफेर (interpolation) किया गया
- यह कृत्य जालसाजी और आपराधिक षड्यंत्र के दायरे में आता है
इसी आधार पर Ambattur Police Station में IPC की कई धाराओं के तहत FIR दर्ज हुई और चार्जशीट दाखिल की गई।
🏛️ हाईकोर्ट कार्यवाही: मेडिकल बोर्ड की राय के बावजूद मुकदमा जारी
मामला Madras High Court पहुँचा, जहाँ:
- एक मेडिकल बोर्ड गठित किया गया
- बोर्ड ने माना कि Orchidectomy चिकित्सकीय रूप से उचित था
- लेकिन अभिभावक की स्पष्ट सहमति आवश्यक थी
इसके बावजूद, हाईकोर्ट ने कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद डॉक्टर ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
🔍 सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण: ‘गुड फेथ’ और सहमति का महत्व
सुप्रीम कोर्ट की पीठ—Justice Manoj Misra और Justice Pamidighantam Sri Narasimha—ने मामले का गहन विश्लेषण किया।
कोर्ट ने विशेष रूप से Indian Penal Code की धाराओं 88 और 92 पर जोर दिया, जो ‘सद्भावना में किए गए कार्य’ को आपराधिक दायित्व से छूट देती हैं।
कोर्ट ने कहा कि चिकित्सा पेशेवरों को अलग दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए, क्योंकि वे रोगी के हित में निर्णय लेते हैं।
📊 मेडिकल साक्ष्य: वैकल्पिक प्रक्रिया भी चिकित्सकीय रूप से सही
मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार:
- Orchidectomy, Orchidopexy का एक स्वीकार्य विकल्प है
- यह भविष्य में कैंसर के जोखिम को कम करने के लिए किया जाता है
- सर्जन द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया चिकित्सकीय रूप से उचित थी
कोर्ट ने पाया कि सहमति पत्र में दोनों प्रक्रियाएँ “slash” के साथ दर्ज थीं, जिससे स्पष्ट होता है कि वैकल्पिक प्रक्रिया पर विचार किया गया था।
❗ महत्वपूर्ण निष्कर्ष: मात्र ‘इंटरपोलेशन’ से अपराध नहीं बनता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
- सहमति पत्र में कथित बदलाव मात्र से आपराधिक इरादा सिद्ध नहीं होता
- अलग स्याही, हस्तलेखन या दुर्भावना का कोई प्रमाण नहीं मिला
- ऐसे मामलों में आपराधिक मुकदमा चलाना उचित नहीं
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि Section 482 CrPC के तहत न्यायालय ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है ताकि “कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग” रोका जा सके।
✅ फैसला: डॉक्टर के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द
सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने:
- अपील स्वीकार की
- हाईकोर्ट का आदेश निरस्त किया
- डॉक्टर के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया
📌 निष्कर्ष: चिकित्सा निर्णयों को आपराधिक नजरिए से नहीं देखना चाहिए
यह फैसला स्पष्ट करता है कि यदि कोई चिकित्सा प्रक्रिया:
- वैध सहमति के दायरे में हो
- चिकित्सकीय रूप से उचित हो
- और उसमें दुर्भावना न हो
तो ऐसे मामलों में आपराधिक मुकदमा चलाना न्यायसंगत नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय के माध्यम से चिकित्सा पेशेवरों को अनावश्यक आपराधिक मुकदमों से संरक्षण देने की दिशा में महत्वपूर्ण संदेश दिया है।
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